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भगवान श्री राम जी की मृत्यु कैसे हुई? राम कथा

श्री राम जी की मृत्यु का सच
भगवान श्री राम की मृत्यु कैसे हुई? मृत्यु का अर्थ है समाप्ति। क्योंकि भगवान और आत्मा की मृत्यु नहीं होती। अतएव यह प्रश्न करना गलत हो गया की 'श्री राम की मृत्यु कैसे हुई?' लेकिन यह प्रश्न मन में जरूर उठता है की भगवान राम यह संसार से कब और कैसे अलक्षित (आँखों से ओझल) हो गए या भगवान श्री राम ने अयोध्या छोड़ कर वैकुण्ठ लोक कैसे गये या भगवान राम ने प्रस्थान कैसे किया? तो इस बारे में वाल्मीकि रामायण में विस्तार पूर्वक वर्णित है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार यमराज ऋषि का भेष बनाकर राम से एकांत में वार्ता करने की इच्छा प्रकट की और यह शर्त भी रखा की जो भी व्यक्ति उनकी (राम और ऋषी के बिच की) बात सुनेगा उसे मृत्यु दंड दिया जाये। किन्तु लक्ष्मण जी दुर्वासा जी के श्राप के भय से ऋषि (यमराज) के शर्त को भंग कर श्री राम के पास महर्षि दुर्वासा की सुचना दी। इसलिए राम ने शर्त के अनुसार लक्ष्मण जी का त्याग कर दिया। विस्तार पूर्वक पढ़े भगवान लक्ष्मण जी की मृत्यु कैसे हुई?

श्री राम की मृत्यु कैसे हुई?

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग १०७ से सर्ग ११० तक विस्तार से राम की मृत्यु (प्रस्थान) के बारे में लिखा है।
विसृज्य लक्ष्मणं रामो दुःखशोकसमन्वितः। पुरोधसं मन्त्रिणश्च नैगमांश्चेदमब्रवीत्॥७.१०७.१॥
अद्य राज्येऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम्। अयोध्यायां पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम्॥७.१०७.२॥
प्रवेशयत सम्भारान्मा भूत्कालात्ययो यथा। अद्यैवाहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन गतां गतिम्॥७.१०७.३॥
भावार्थ:- लक्ष्मण का त्याग करके श्री राम दुःख-शोक में मग्न हो गये तथा पुरोहित, मंत्री और महाजनो से इस प्रकार बोले - 'आज मैं अयोध्या के राज्य पर धर्मवत्सल वीर भाई भरत का राजा के पद पर अभिषेक करूँगा। उसके बाद वन को चला जाऊँगा। शीग्र ही सब समाग्री जुटाकर ले आओ। अब अधिक समय नहीं बिताना चाहिए। मैं आज ही लक्ष्मण के पथ का अनुसरण करूगाँ। (लक्ष्मण के पथ का मतलब अब मैं संसार से प्रस्थान करूगाँ।)
श्री राम जी की यह बात सुनकर प्रजावर्गके सभी लोग धरती पर माथा टेककर पड़ गये और प्राणहीन-से हो गये।
भरतश्च विसंज्ञोऽभूच्छ्रुत्वा रामस्य भाषितम्। राज्यं विगर्हयामास राघवं चेदमब्रवीत्॥७.१०७.५॥
सत्येन हि शपे राजन्स्वर्गलोके न चैव हि। न कामये यथा राज्यं त्वां विना रघुनन्दन॥७.१०७.६॥
इमौ कुशीलवौ राजन्नभिषिञ्च नराधिप। कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम्॥७.१०७.७॥
शत्रुघ्नस्य तु गच्छन्तु दूतास्त्वरितविक्रमाः। इदं गमनमस्माकं स्वर्गायाख्यान्तु माचिरम्॥७.१०७.८॥
भावार्थ:- श्रीरामचंद्र जी की वह बात सुनकर भरत का तो होश ही उड़ गया। वे राज्य को निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले - 'राजन! रघुनन्दन! मैं सत्य की शप्त खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहियें, स्वर्ग का भोग भी नहीं चाहियें। राजन! नरेश्वर! आप कुश और लवका राज्यभिषेक कीजिये। दक्षिण कोशल में कुश को और उत्तर कोशल में लव को राजा बनाईये।' भरत जी ने तेज चलनेवाले दूत को शीघ्र ही शत्रुघ्न के पास जाने को कहा। और कहा कि उन्हें हम लोगों की इस महायात्रा का वृतान्त सुनाये। इसमें विलम्भ नहीं होना चाहियें।
भरत की बात सुनकर पूरवासियों को नीचे मुख किये दु:ख से संतप्त होते देख महर्षि वशिष्ठ ने कहा - 'वत्स राम पृथ्वी पर पड़े हुए इन प्रजाजनों की ओर देखो। इनका अभिप्राय जानकर इसी के अनुसार कार्य करो। इनकी इच्छा के विपरीत करके इन बेचारों का दिल ना दुखाओ।' वशिष्ठ जी के कहने पर रघुनाथ जी ने प्रजाजनों को उठाया और पूछा- 'मैं आप लोगों का कौन सा कार्य सिद्ध करूं?'
ततः सर्वाः प्रकृतयो रामं वचनमब्रुवन्। गच्छन्तमनुगच्छामो यतो राम गमिष्यसि॥७.१०७.१२॥
पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तमः। सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समं गच्छाम सत्पथम्॥७.१०७.१३॥
तपोवनं वा दुर्गं वा नदीमम्भोनिधिं तथा। वयं ते यदि न त्याज्याः सर्वान्नो नय ईश्वर॥७.१०७.१४॥
एषा नः परमा प्रीतिरेष धर्मः परो मतः। हृद्गता नः सदा तुष्टिस्तवानुगमने दृढा॥७.१०७.१५॥
भावार्थ:- तब प्रजा वर्ग के सभी लोग श्रीराम से बोले- 'रघुनंदन आप जहाँ भी जायेंगे आपके पीछे पीछे हम भी वहीं चलेंगे यदि पूरवासियों पर आपका प्रेम है यदि हम पर आपका परम उत्तम स्नेह है तो हमें साथ चलने की आज्ञा दीजियें। हम अपने स्त्री पुत्रों सहित आपके साथ ही सन्मार्ग (सत्य मार्ग) पर चलने को उद्यत (तैयार) हैं। स्वामिन! आप तपोवन में या किसी दुर्गम स्थान में अथवा नदी या समुद्र में जहाँ-कहीं भी जायें, हम सबको साथ लेकर चलें। यदि आप हमें त्याग ने योग्य नहीं मानते हैं तो ऐसा ही करें। यही हमारे ऊपर आपकी सबसे बड़ी कृपा होगी और यही हमारे लिए आपका परम उत्तम वर होगा। आपके पीछे चलने में ही हमें सदा हार्दिक प्रसन्नता होगी।'
प्रजा जन की भक्ति देखकर श्री रामचंद्र जी ने 'तथास्तु' कह कर उनकी इच्छा का अनुमोदन किया और कर्तव्य का निश्चय करके राम जी ने दक्षिण कोशल के राज्य पर कुश और उत्तर कोशल के राज्य को लव को दे दिया। फिर राम ने लव व कुश को सेना व धन देकर अपनी-अपनी राजधानी भेज दिया।
इसके बाद श्री राम के प्रस्थान का समाचार सुनकर सुग्रीव आदि वानरों तक रीछों (रीछों (भालू) के राजा जाम्बवन्त) पहुंचे। वह भी श्रीराम के साथ चलने का मन बना लिए थे। जिस के उपरांत श्री रामचंद्र जी ने सभी भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछों के साथ परमधाम जाने का निश्चय किया और विभीषण, हनुमान जाम्बवन्त, मैन्द, एवं द्विविद (जो वानरों के राजा सुग्रीव के मन्त्री थे और मैन्द के भाई थे।) इन सभी को पृथ्वी पर ही रहने का आदेश दिया।
अग्निहोत्रं व्रजत्वग्रे सर्पिर्ज्वलितपावकम्॥७.१०९.२॥
कुशान्गृहीत्वा पाणिभ्यां प्रसज्य प्रययावथ॥७.१०९.४॥
रामस्य पार्श्वे सव्ये तु पद्मा श्रीः सुसमाहिता॥७.१०९.७॥
भावार्थ:- श्रीराम के अग्निहोत्र की प्रज्ज्वलित आग ब्राह्मणों के साथ आगे आगे चले। श्री राम ने दोनों हाथों में कुश लेकर परब्रह्म के प्रतिपादक वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए सरयू नदी के तट पर चले। भगवान श्री राम के दाहिने पार्श्व में कमल लिए श्रीदेवी (लक्ष्मी अथवा सीता जी थी क्योंकि लक्ष्मी जी के हाथ में कमल होता है) उपस्थित थी।
शरा नानाविधाश्चापि धनुरायतमुत्तमम्। तथा ऽ ऽयुधानि ते सर्वे ययुः पुरुषविग्रहाः॥७.१०९.७॥
द्रष्टुकामो ऽथ निर्यान्तं रामं जानपदो जनः। यः प्राप्तः सो ऽपि दृष्ट्वैव स्वर्गायानुगतो मुदा॥७.१०९.१८॥
ऋक्षवानररक्षांसि जनाश्च पुरवासिनः। आगच्छन्परया भक्त्या पृष्ठतः सुसमाहिताः॥७.१०९.१९॥
भावार्थ:- नाना प्रकार के बाण एवं उत्तम धनुष तथा दूसरे-दूसरे अस्त्र-शस्त्र सभी पुरुष शरीर धारण करके भगवान के साथ चलें। जनपद के लोगों में से जो श्रीराम की यात्रा देखने के लिए आए थे, वह सब समारोह देखते ही भगवान के साथ परमधाम जाने को तैयार हो गये। रीछ (भालू), वानर, राक्षस और पूरवासी मनुष्य बड़ी भक्ति के साथ श्रीरामचंद्रजी के पीछे-पीछे एकाग्रचित होकर चले आ रहे थे।
यानि भूतानि नगरे ऽप्यन्तर्धानगतानि च। राघवं तान्यनुययुः स्वर्गाय समुपस्थितम्॥७.१०९.२०॥
नोच्छ्वसत्तदयोध्यायां सुसूक्ष्ममपि दृश्यते । तिर्यग्योनिगताश्चापि सर्वे राममनुव्रताः॥७.१०९.२२॥
अथ तस्मिन्मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः। सर्वैः परिवृतो देवैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः॥७.११०.३॥
आययौ यत्र काकुत्स्थः स्वर्गाय समुपस्थितः। विमानशतकोटीभिर्दिव्याभिरभिसंवृतः॥ ७.११०.४॥
भावार्थ:- अयोध्या नगर में जो अदृश्य प्राणी रहते थे, वे भी साकेतधाम (परम्धाम) जाने के लिए उद्यत (तैयार) हुए श्रीरघुनाथजी के पीछे-पीछे चल दिये। उस समय अयोध्या में सांस लेने वाला कोई छोटा-से-छोटा प्राणी भी रह गया हो, ऐसा नहीं देखा जाता था। (अर्थात सभी प्राणी अयोध्या नगर से राम के साथ चल दिये।) तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियों आदि की योनि) समस्त जीव भी श्रीराम में भक्ति भाव रखकर उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे। उस समय लोकपितामह ब्रह्माजी संपूर्ण देवताओं तथा महात्मा ऋषि-मुनियों से घिरे हुए उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ श्रीरघुनाथजी परमधाम पधारने के लिए उपस्थित थे। उनके साथ करोड़ों दिव्य विमान शोभा पा रहे थे।
तस्मिंस्तूर्यशतैः कीर्णे गन्धर्वाप्सरसङ्कुले । सरयूसलिलं रामः पद्भ्यां समुपचक्रमे ॥७.११०.७॥
भावार्थ:- उस समय सैकड़ों प्रकार के बाजे बज रहे थे और गंधर्व तथा अप्सराओं से वह स्थान भर गया था। इतने में ही श्रीरामचंद्रजी सरयू के जल में प्रवेश करने के लिए दोनों पैर आगे बढ़ाने लगे।

तब ब्रह्मा जी ने कहा राम भगवान विष्णु और ब्रह्म (निराकार स्वरूप वाले) है।

ततः पितामहो वाणीमन्तरिक्षादभाषत। आगच्छ विष्णो भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तो ऽसि राघव॥७.११०.८॥
भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्व स्विकां तनुम्। यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम्॥७.११०.९॥
वैष्णवीं तां महातेजस्तदाकाशं सनातनम्। त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां के चित्प्रजानते॥७.११०.१०॥
ऋते मायां विशालाक्ष तव पूर्वपरिग्रहाम्। त्वमचिन्त्यं महद्भूतमक्षयं सर्वसङ्ग्रहम्। यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम्॥७.११०.११ ॥
भावार्थ:- तब ब्रह्माजी आकाश से बोले- "श्रीविष्णुरूप रघुनंदन! आइये, आप का कल्याण हो। हमारा बड़ा सौभाग्य है, जो आप अपने परमधाम को पधार रहे हैं। महावाहो! आप देवतुल्य तेजस्वी स्वरूप भाइयों के साथ अपने स्वरूपभूत (वैकुण्ठ) लोक में प्रवेश करें। आप जिस स्वरुप में प्रवेश करना चाहें, आप उस रूप में प्रवेश करें। महातेजस्वी परमेश्वर! आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णुरूप में ही प्रवेश करें अथवा सनातन आकाशमय अव्यक्त ब्रह्म (निकराकर) रूप में ही विराजमान हो। आप ही संपूर्ण लोगों के आश्रय हैं। आपकी पुरातन पत्नी योगमाया स्वरूपा जो विशाल लोचन सीतादेवी है उनको छोड़कर दूसरे कोई आप को यथार्थ रूप में नहीं जानते है; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी तथा जरा आदि अवस्थाओं से रहित परब्रह्म है, अतः महातेजस्वी राघवेंद्र! आप जिसमें चाहें, अपने उस स्वरुप में प्रवेश करें।

भगवान राम मरे नहीं वो उसी (राम वाले) शरीर सहित विष्णु बने।

पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः।
विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः॥७.११०.१२॥
भावार्थ:- पितामह ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर परम बुद्धिमान श्री रघुनाथ जी ने कुछ निश्चय करके भाइयों के साथ शरीर सहित अपने वैष्णो तेज (विष्णु शरीर) में प्रवेश किया।
७.११०.१२ श्लोक से यह सिद्ध हो जाता है कि भगवान राम का जो शरीर था वह दिव्य शरीर था, हमारी तरह प्राकृत (माया का) शरीर नहीं था। क्योंकि भगवान विष्णु दिव्य शरीर वाले हैं और इस श्लोक में यह कहा गया कि राम शरीर सहित विष्णु शरीर में प्रवेश किये। विस्तार पूर्वक पढ़ें भगवान राम का शरीर दिव्य था या मनुष्य की भाती प्राकृत था?
अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह। एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत॥७.११०.१६॥
इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशस्विनः। भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते॥७.११०.१७॥
तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः। लोकान्सान्तानिकान्नाम यास्यन्तीमे समागताः॥७.११०.१८॥
यच्च तिर्यग्गतं किञ्चित्त्वामेवमनुचिन्तयत्। प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या वै तत्सन्ताने निवत्स्यति॥७.११०.१९॥
सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युक्ते ब्रह्मलोकादनन्तरे॥७.११०.२०॥
भावार्थ:- तत्पश्चात विष्णु स्वरूप में विराजमान महातेजस्वी श्री राम ब्रह्माजी से बोले - 'उत्तम व्रत का पालन करने वाले पितामह! इस संपूर्ण जन समुदाय को भी आप उत्तम लोग प्रदान करें। ये सब लोग स्नेहवश मेरे पीछे आए हैं। ये सब-के-सब यशस्वी और मेरे भक्त हैं। इन्होंने मेरे लिए अपने लौकिक सुख का परित्याग कर दिया है। अतः ये सर्वथा मेरे अनुग्रह के पात्र हैं।' भगवान विष्णु का यह वचन सुनकर लोक गुरु भगवान ब्रह्मा जी बोले - 'भगवन यहाँ आये हुए यह सब लोग संतानक नामक लोक में जाएंगे। पशु-पक्षियों की योनियों में पड़े हुए जीवों में से जो भी कोई आपका भक्ति भाव से चिंतन करता हुआ प्राणों का परित्याग करेगा, वह संतानक लोक में ही निवास करेगा। यह संतानक लोक ब्रह्मलोक के निकट है। ब्रह्मा के सत्य-संकल्प आदि सभी उत्तम गुणों से युक्त है। उसी में ये आपके भक्तजन निवास करेंगे।'
तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम्। ७.११०.२४।।
सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवपूंषि तु। दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन्॥७.११०.२५॥
गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च। प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन्॥७.११०.२६॥
ततः समागतान्सर्वान्स्थाप्य लोकगुरुर्दिवि। जगाम त्रिदशैः सार्धं सदा हृष्टैर्दिवं महत्॥७.११०.२८॥
भावार्थ:- पशु पक्षी की योनियों में पड़े हुए सैकड़ों प्राणि सरयूके जल में गोता लगाकर तेजस्वी शरीर धारण करके दिव्य लोगों में जा पहुँचे। वे दिव्य शरीर धारण करके दिव्य अवस्था में स्थित हो देवताओं के समान मान्य हो गये। स्थावर और जंगम सभी तरह के प्राणी सरयूके जल में प्रवेश करके उस जल में अपने शरीर को भिगो कर दिव्य लोक में जा पहुँचे। इस प्रकार वहाँ आए सभी प्राणी संतानक लोक में स्थान देकर लोक गुरु ब्रह्मा जी हर्षित और आनंद से भरे हुए देवताओं के साथ अपने महान धाम में चले गये।
७.११०.२५ - इस श्लोक में यह कहा गया है कि सभी प्राणी सरयू नदी के जल में गोता लगाकर दिव्य शरीर धारण करके दिव्य लोक में पहुँचे। लेकिन भगवान राम के बारे में ७.११०.१२ श्लोक में लिखा है कि भगवान ने राम शरीर को ही विष्णु शरीर में परिवर्तित करके अपने विमान में बैठे। अतएव भगवान का शरीर प्राकृत शरीर नहीं था यह बात फिर से सिद्ध हो गई।

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