भगवान निराकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

भगवान निराकार है - वेद के प्रमाण

हमने अबतक आपको वेद के अनेक प्रमाणों द्वारा यह बताया है कि भगवान साकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। अब हम आपको वेदों के प्रमाणों द्वारा बतायेगें कि वेदों में भगवान के निराकार स्वरूप का वर्णन है। यह प्रमाण वेदों के उत्तर भाग और अंतिम भाग उपनिषदों का है। यह ध्यान रहे की उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं, अतएव यह वेद का ही अंश है।

अब हम आपको निम्नलिखित वेद मन्त्रों द्वारा परब्रह्म परमेश्वर के निराकार स्वरूप का वर्णन करेंगे -

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः॥
- मुण्डकोपनिषद् १.१.६

भावार्थ :- वह जो जानने में न आने वाला, पकड़ने में न आने वाला, गोत्र आदि से रहित, रंग और आकृति से रहित, नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से भी रहित और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियों से भी रहित है, तथा वह जो नित्य, सर्वव्यापक, सब में फैला हुआ, अत्यन्त सूक्ष्म और अविनाशी परब्रह्म है, ...।

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते॥
- कठोपनिषद् १.३.१५

भावार्थ :- जो शब्द रहित, स्पर्श रहित, रूप रहित, रस रहित और बिना गंध वाला है। तथा जो अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (असीम) महान आत्मा से श्रेष्ठ एवं सर्वथा सत्य तत्व है, उस परमात्मा को जानकर (मनुष्य) मृत्यु के मुख से सदा के लिए छूट जाता है।

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः॥
- मुण्डकोपनिषद् २.१.२

भावार्थ :- निश्चय ही दिव्य पूर्ण पुरुष आकाररहित, समस्त जगत के बहार और भीतर भी व्याप्त है। जन्मादि विकारों से अतीत, प्राण रहित, मन रहित होने के कारण सर्वथा विशुद्ध है, इसलिए अविनाशी जीवात्मा से अत्यंत श्रेष्ठ है। 

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं
प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥
- माण्डूक्योपनिषद् ७

भावार्थ :- जो न भीतर की ओर प्रज्ञावाला है, न बाहर की ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जानने वाला है, न नहीं जानने वाला है, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहार में नहीं लाया जा सकता, जो पकड़ने में नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करने में नहीं आ सकता, जो बतलाने में नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मसत्ता की प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है, जिसमे प्रपञ्च का सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शांत करयाणमय अद्वितीय तत्व परब्रह्म परमात्मा का चौथा पद है। इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते है, वह परमात्मा है, वह जानने योग्य है।

यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं
प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।
- तैत्तिरीयोपनिषद् २.७

भावार्थ :- क्योंकि जब कभी यह जीवात्मा इस देखने में न आने वाले शरीर रहित, बतलाने में न आनेवाले और दूसरे का आश्रय न लेनेवाले परमात्मा में निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता है, तब वह निर्भीय पद को प्राप्त हो जाता है।

ततो यदुत्तरततं तदरूपमनामयम्।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति अथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥
- श्वेताश्वतरोपनिषत् ३.१०

भावार्थ :- उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भ से जो अत्यंत उत्कृष्ट है, वह परब्रह्म परमात्मा आकार रहित और सब प्रकार के दोषों से शून्य है। जो इस परब्रह्म परमात्मा को जानते है, वे अमर हो जाते है। परन्तु इस रहस्य को न जानने वाले दूसरे लोग बार-बार दुःख को ही प्राप्त होते है।

उपर्युक्त वेदों के प्रमाणों में भगवान को जानने में न आने वाला, पकड़ने में न आने वाला, गोत्र आदि से रहित, रंग और आकृति से रहित, नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से भी रहित और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियों से भी रहित, शब्द रहित, स्पर्श रहित, रूप रहित, रस रहित और बिना गंध वाला, दिव्य पूर्ण पुरुष आकारहित, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहार में नहीं लाया जा सकता, जो पकड़ने में नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करने में नहीं आ सकता, जो बतलाने में नहीं आ सकता, वह परब्रह्म परमात्मा आकारहित और सब प्रकार के दोषों से शून्य है - ऐसा कहा गया है। सनातन धर्म में निराकार भगवान के स्वरूप को 'ब्रह्म' कहकर सम्बोधित करते है। अधिक जानने के लिए पढ़ें क्या हिन्दू एक भगवान में मानते है, ब्रह्म परमात्मा और भगवान कौन है?

अस्तु, अतएव उपर्युक्त वेदों के प्रमाणों अनुसार भगवान (ब्रह्म) का निराकार स्वरूप होता है। लेकिन वेदों में भगवान के साकार स्वरूप का भी निरूपण है। अवश्य पढ़े भगवान साकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

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