भगवान साकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

भगवान् साकार है - वेद के प्रमाण

हमने अबतक आपको वेद के अनेक प्रमाणों द्वारा यह बताया है कि भगवान निराकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। अब हम आपको वेदों के प्रमाणों द्वारा बतायेगें कि वेदों में भगवान के साकार स्वरूप का वर्णन है। यह प्रमाण वेदों के उत्तर भाग और अंतिम भाग उपनिषदों का है। यह ध्यान रहे की उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं, अतएव यह वेद का ही अंश है।

अब हम आपको निम्नलिखित वेद मन्त्रों द्वारा भगवान के साकार स्वरूप का वर्णन करेंगे -

अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
- कठोपनिषद् १.२.२०

भावार्थ:- इस जीवात्मा के हृदयरूप गुफा में रहने वाला परमात्मा सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान से भी महान है। परमात्मा की उस महिमा को कामनारहित और चिन्तानरहित (कोई विरला साधक) सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पता है।

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.३, यजुर्वेद १७.१९, अतर्ववेद १३.२६ और ऋग्वेद १०.८१.३ में भी इसी प्रकार है।

भावार्थ :- सब जगह आँख वाला तथा सब जगह मुख वाला, सब जगह हाथ वाला और सब जगह पैर वाला, आकाश और पृथ्वी की सृष्टि करने वाला, वह एकमात्र देव (परमात्मा) मनुष्य आदि जीव को दो-दो हाथों से युक्त करता है तथा (पक्षी-पतंग आदि को) पाँखों से युक्त करता है।

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.५ और यजुर्वेद १६.२ का मन्त्र है।

भावार्थ :- हे रुद्रदेव! तेरी जो भयानकता से शून्य (सौभ्य) पुण्य से प्रकाशित होने वाली तथा कल्याणमयी मूर्ति है। हे पर्वत पर रहकर सुख विस्तार करने वाले शिव! उस परम् शांत मूर्ति से (तू कृपा करके) हम लोगों को देख।

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.१४, यजुर्वेद ३१.१ अतर्ववेद १९.६.१ और ऋग्वेद १०.९०.१ में मंत्र है।

भावार्थ :- वह परम पुरुष हजारों सिर वाला, हजारों आँख वाला और हजारों पैर वाला, वह समस्त जगत को सब ओर से घेर कर नाभि से दस अङ्गुल ऊपर (हृदय में) स्थित है।

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ४.३ और अतर्ववेद १०.८.२६ में भी आया है।

भावार्थ :-तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार अथवा कुमारी है। तू बूढ़ा होकर लाठी के सहारे चलता है तथा तू ही विराटरुप में प्रकट होकर सब ओर मुख-वाला हो जाता है।

उपर्युक्त वेदों के प्रमाणों का सार यह है कि भगवान अपने आप को प्रकट कर आँख, कान, हाथ, पैर, नाम (शिव), स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी, बूढ़ा तथा विराटरुप वाले हो जाते है और उनकी कृपा से उनको देखा जा सकता है। सनातन धर्म में साकार भगवान के स्वरूप को 'परमात्मा' तथा 'भगवान्' कहकर सम्बोधित करते है। अधिक जानने के लिए पढ़ें क्या हिन्दू एक भगवान में मानते है, ब्रह्म परमात्मा और भगवान कौन है?

अस्तु, अतएव उपर्युक्त वेदों के प्रमाणों अनुसार भगवान का साकार स्वरूप होता है। लेकिन वेदों में भगवान के निराकार स्वरूप का भी निरूपण है। अवश्य पढ़े भगवान निराकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। तो क्या भगवान का स्वरूप निराकार और साकार दोनों का है? अगर है तो क्या कोई वेद मन्त्र भगवान के दो स्वरूप की पुस्टि करता है? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए पढ़े भगवान निराकार और साकार दोनों है? - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

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