ज्ञानकाण्ड

वैदिक ज्ञानकाण्ड

वेदों में कई मार्ग हैं जिनके माध्यम से मनुष्य अपने परम् लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। मूलतः वेद तीन काण्डों में विभक्त है अर्थात् तीन मार्ग है - १. कर्मकाण्ड २. ज्ञानकाण्ड ३. भक्ति / उपासनाकाण्ड। इस लेख में, हम ज्ञानकांड / ज्ञान मार्ग के बारे में जानेंगे, की ज्ञानकाण्ड क्या है, इसके कितने भाग हैं और कितने ग्रंथ हैं?

‘ज्ञानकाण्ड’ शब्द

ज्ञानकाण्ड शब्द ज्ञान और काण्ड से मिलकर बना है। जैसे असत्य के ज्ञान को अज्ञान कहते है, वैसे ही सत्य के ज्ञान, ज्ञान कहते है। इस प्रकार ज्ञान का अर्थ सत्य का ज्ञान और काण्ड का अर्थ किसी घटना से है। उदाहरण से समझें - “सूर्य उदय होना” यह एक घटना है, अब इस घटना का ज्ञान करना है तो इसके लिए आपको ज्ञानकाण्ड जानना होगा। दूसरा उदाहरण से समझे - “आपका जन्म हुआ।” यह एक महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन, आपका जन्म क्यों हुआ? आप कौन है? इस तरह के गूढ़ प्रश्नों को जानने के लिए, आपको ज्ञानकाण्ड जानना होगा। यानी यदि ज्ञान की जिज्ञासा है तो आपके लिए ज्ञानकाण्ड है।

ज्ञानकाण्ड के मुख्य अंग

वेद का अधिकांश कर्मकाण्ड से परिपूर्ण है, शेष अल्प भाग ज्ञानकाण्ड है। एक लाख वेद मन्त्र में से चार हजार ज्ञान काण्ड की ऋचाएँ हैं। जिसमें जीव और ब्रह्म के पारस्परिक संबंध, स्वरूप, लोक, परलोक आदि पर विचार किया गया हैं। इसके अतिरिक्त, ज्ञानकांड में भगवान के निराकार स्वरूप पर अधिक विचार किया गया हैं। इसलिए जो निराकार ब्रह्म (भगवान) के स्वरूप के उपासक हैं उन्हें ज्ञानी कहा जाता है। वेद के ज्ञानकाण्ड के अधिकारी बहुत थोड़े से व्यक्ति होते हैं। अधिकांश कर्मकाण्ड के अधिकारी हैं। तुलसीदास जी रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखते है ‘ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥’ अर्थात् “ज्ञान का मार्ग कृपाण (दोधारी तलवार) की धार के समान है। हे पक्षीराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती।” इसलिए ज्ञान मार्ग पर चलना बहुत ही कठिन है।

ज्ञानकाण्ड के बारे में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये अनुभव का मार्ग है। वास्तव में हम सत्य को तभी स्वीकार करते है, जब हम उसे अनुभव करले। इसलिए ज्ञानीजन ध्यान अवस्था में अधिक रहते है। अब यदि ज्ञानिओं की भाषा में कहे, तो सत्य से हमारा योग कैसे हो उसके लिए ज्ञानकांड को जानना होगा। ध्यान दे, योग का अर्थ होता है मिलन। वियोग, संयोग अर्थात उससे अलग हो जाना, उससे अचानक मिल जाना। तो सत्य यानी सरल शब्दों में ब्रह्म से कैसे मिले, उनसे हमारा योग कैसे हो, उसके लिए ज्ञानकाण्ड में मुख्य रूप से दो मार्ग हैं। १. ज्ञानयोग और २. ध्यानयोग।

ज्ञानयोग

ज्ञान के माध्यम से ब्रह्म स्वरूप का ज्ञान, वास्तविक सत्य का ज्ञान ही ज्ञानयोग है। ज्ञान हो जाने पर जीव का ब्रह्म (भगवान) से मिलन हो जाता है इसलिए इसे ज्ञान योग कहते है। इस ज्ञानयोग में आठ अंतरंग साधन हैं। वो हैं - १. विवेक, २. वैराग्य, ३. शमादि षट्सम्पत्ति (शम, दम, श्रद्धा, उपरति, तितिक्षा और समाधान), ४. मुमुक्षुत्व, ५. श्रवण, ६. मनन, ७. निदिध्यासन और ८. समाधि। इन्हें ही आमतौर से ज्ञानमार्ग कहा जाता है।

ध्यानयोग

ज्ञानयोग की ही तरह, ध्यानयोग के भी आठ अंग हैं। वो हैं - १. यम, २. नियम, ३. आसन, ४. प्राणायाम, ५. प्रत्याहार, ६. धारणा, ७. ध्यान और ८. समाधि। जैसे ज्ञानयोग का अंत समाधि पर है वैसे ही ध्यानयोग का अंत भी समाधि पर ही है। इन्हें ही आमतौर से योगमार्ग कहा जाता है।

ज्ञानकाण्ड के ग्रंथ

ज्ञानकाण्ड के बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, वे है - उत्तर मीमांसा दर्शन (वेदान्त दर्शन) और पतञ्जलि योगसूत्र। इसके रचिता वेदव्यास जी है। इसके अलावा, जो वेद के अंश उपनिषद् है वो भी ज्ञान मार्ग के ग्रंथ है। ध्यान दे, उपनिषदों में ज्ञान और उपासना दोनों हैं। इसलिए उपनिषद् ज्ञानकाण्ड और भक्तिकाण्ड (उपासनाकाण्ड) दोनों के मुख्य स्रोत हैं।

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