भक्तिकाण्ड / उपासनाकाण्ड

उपासनाकाण्ड क्या है?

वेदों में कई मार्ग हैं जिनके माध्यम से मनुष्य अपने परम् लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। मूलतः वेद तीन काण्डों में विभक्त है अर्थात् तीन मार्ग है अपने परम् लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए - १. कर्मकाण्ड २. ज्ञानकाण्ड ३. भक्ति / उपासनाकाण्ड। इस लेख में, हम भक्ति / उपासनाकाण्ड के बारे में जानेंगे, की भक्तिकांड क्या है, इसके कितने प्रकार हैं और कितने ग्रंथ हैं?

‘भक्तिकाण्ड’ शब्द

भक्तिकाण्ड शब्द ‘भक्ति’ और ‘काण्ड’ से मिलकर बना है। भक्ति के बारे में हमें इस लेख में विस्तार से बता है। यहाँ संक्षेप में समझिये कि ‘भज्’ धातु में ‘क्तिन्’ प्रत्यय होने से भक्ति शब्द का निर्माण हुआ है। ‘भज् सेवायाम्’ - ‘भज्’ धातु का अर्थ है सेवा करना। इसलिए ‘भक्ति’ शब्द का अर्थ है ‘सेवा करना’। अब किसकी प्रेमपूर्वक सेवा करना? जिसकी आप भक्ति कर रहे है, यानी अपने आराध्य की। वो आराध्य देश, मातृ, पितृ, गुरु, देव इत्यादि हो सकते हैं। जैसे देश की प्रेमपूर्वक सेवा करना देश भक्ति ऐसे ही मातृ की सेवा करना मातृ भक्ति, पितृ की सेवा करना पितृ भक्ति, गुरु की सेवा करना गुरु भक्ति इत्यादि। अतः भक्ति तो आप समझ ही गए, प्रेमपूर्वक सेवा और काण्ड का अर्थ ‘किसी घटना’ से है। अब इस घटना को ध्यान से समझिये।

भक्ति का अर्थ ‘अपने आराध्य की प्रेमपूर्वक सेवा करना है’, लेकिन सेवा का अभिप्राय किसी के हाथ-पैर को दबाना ही नहीं है, सेवा तो अनेकों प्रकार की होती हैं। मनुष्य अपने सभी इन्द्रियों से सेवा करता हैं - तन, मन और धन सबसे सेवा की जाती है। तन, मन और धन से भक्ति करना (सेवा करना) भी तो एक घटना है। अतः यह सेवा कैसे करे? भक्ति कैसे करे? उसके लिए आपको भक्ति काण्ड जानना होगा।

भक्तिकाण्ड उपासनाकाण्ड कैसे है?

एक लाख वेद मन्त्र में से सोलह हजार उपासना काण्ड की ऋचाएँ है। ‘उपासना’ शब्द ‘उप + आसन’ से बना है, ‘उप यानी उसके निकट, समीप और आसन यानी बैठना।’ तो उसके निकट बैठना, किसके निकट बैठना? अपने आराध्य के। तो आराध्य के निकट कैसे बैठे? उनके पास कैसे पहुंचे? उसके लिए आपको उपासना काण्ड जानना होगा। लेकिन ध्यान दे, समीप बैठ के क्या करेंगे? मान लीजिये अपने ने उपासनाकाण्ड द्वारा बताए गए मार्ग से आप अपने आराध्य के निकट बैठ गये, तो कुछ तो आप करेंगे क्योंकि आप अपने आराध्य से प्रेम करते है। तो जो कुछ आप आराध्य के प्रति प्रेम से करेंगे उसे सेवा कहा जाता है। इसे ऐसे समझे कि जब माँ अपने बच्चे के निकट होती है तब वो जो कुछ करती है वो उसके बच्चे की सेवा ही तो है। अतः चूँकि सेवा ही भक्ति है, इसलिए उपासना काण्ड का दूसरा नाम भक्तिकांड भी है।

भक्तिकाण्ड में क्या है?

उपासनाकाण्ड या भक्तिकाण्ड में मुख्य रूप से ईश्वर-भजन की विधि बताई गई है। इसके पालन करने से मनुष्य को लोक-परलोक में सुख मिलता है और ईश्वर की प्राप्ति होती है। इस उपासना काण्ड के मार्ग पर चलने वाले को भक्त कहा जाता है। कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के सभी अधिकारी नहीं होते हैं। परन्तु भक्ति / उपासना काण्ड के सभी अधिकारी है चाहे वो किसी भी वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का हो या किसी भी आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्था, वानप्रस्थ, संन्यास) में हो। सभी लोग उपासना काण्ड के अधिकारी है।

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥87 क॥
- श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड

अर्थात् :- वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभाव से मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
- गीता ९.३०

अर्थात् :- अगर कोई अतिशय (अत्यंत) दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
- गीता ९.३२

अर्थात् :- हे पार्थ! जो भी पापयोनि वाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परम गति को प्राप्त हो जाते हैं।

अतः उपरोक्त प्रमाणों से यह सिद्ध हुआ कि सभी जीव भगवान की भक्ति करने के अधिकारी हैं। राम नाम लेने के अधिकारी सभी हैं। यहाँ तक की किसी भी अवस्था में राम नाम लिया जा सकता है। क्योंकि भगवान का नाम पवित्र है, वो तो अपवित्रों को पवित्र करते है और स्वयं सदा पवित्र रहते है।

भक्तिकाण्ड के प्रकार

जैसा की आपने जाना कि ‘भजनम् भक्ति’ अर्थात् आराध्य का भजन यानी सेवा करना भक्ति है। लेकिन हमारा आराध्य कौन है? बस इसी से अनेकों प्रकार की भक्ति उत्पन्न होती हैं। जैसे यदि हमारा आराध्य देश, मातृ, पितृ, गुरु, देव इत्यादि हैं। तो क्रमशः देशभक्ति, मातृभक्ति, पितृभक्ति, गुरुभक्ति, देवभक्ति इत्यादि होंगे। अब इन सभी भक्ति को आप दो भागों में विभक्त कर सकते हैं - १. भगवत भक्ति २. भौतिक भक्ति (माया की भक्ति)। क्योंकि वेदों ने कहा की देखों भाई तीन ही तत्व है, इनमें से एक तो तुम स्वयं हो और तुमको छोड़ कर केवल दो ही लोग हैं।

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः।
- श्वेताश्वतरोपनिषद् १.१०

अर्थात् :- प्रकृति (माया) तो विनाशशील है, इनको भोगने वाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन विनाशशील जड-तत्व और चेतन आत्मा दोनों को एक भगवान अपने शासन में रखता है।

यहाँ श्वेताश्वतरोपनिषद् ने कहा कि एक तो प्रकृति (माया) है, एक जीवात्मा अर्थात् तुम और एक भगवान। तो इस तरह जीव को भक्ति करने के लिए दो ही तत्व वो है भगवान या प्रकृति (माया)। देशभक्ति, मातृभक्ति, पितृभक्ति, देवभक्ति आदि माया के लोक के है इसलिए ये सभी भक्ति माया की भक्ति कहलाती है। वही सिद्ध गुरुओं की भक्ति, भक्तों की भक्ति एवं भगवान की भक्ति को भगवत भक्ति कहते हैं। यदि ये कहो कि गुरुओं व भक्तों की भक्ति को भगवत भक्ति कैसे हैं? तो वो ऐसे है कि तुलसी, सुर, मीरा आदि भक्त तथा भगवान प्राप्त गुरु स्वयं भगवान के हो जाते हैं। अतः भक्तों एवं गुरुओं की भक्ति भी भगवान की भक्ति के समान हैं।

भक्तिकांड के ग्रंथ

भक्ति / उपासनाकाण्ड के विषय में तीन महत्वपूर्ण ग्रंथ है - १. नारद भक्ति दर्शन, २. शाण्डिल्य भक्ति दर्शन और ३. आगिरस्य मध्य मीमांसा दर्शन (देवी मीमांसा दर्शन) जो क्रमश देवर्षि नारद, महर्षि शाण्डिल्य और महर्षि अंगिरा द्वारा रचित हैं। इनके अलावा, जो वेद के अंश उपनिषद् है, वो भी उपासना के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है। अब १८ पुराण भी भक्ति के सहायक ग्रंथ हैं, इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण भागवत पुराण है, क्योंकि इसमें भगवान के लीलाओं का बहुत ही अच्छा निरूपण है। तथा रामायण, वैसे तो ये इतिहास है लेकिन भगवान श्री राम की लीला इसमें है इसलिए ये भी लीलापान के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इनके अलावा रामचरित भी भक्ति सहायक ग्रंथ है।

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