नारद भक्ति सूत्र | प्रेम सूत्र

नारद भक्ति सूत्र

वेदों में तीन काण्ड है - कर्म, ज्ञान और भक्ति। इन तीनों की मीमांसा (विवेचना या विचार-विमर्श) के लिए तीन प्रकार के दर्शन शास्त्र हैं। जैसे, कर्म और ज्ञान के अपने-अपने दर्शन-शास्त्र है। वैसे ही, भक्ति का भी दर्शन-शास्त्र है। भक्ति के विषय में तीन दर्शन-शास्त्र बहुत प्रचलित है - १. नारद भक्ति दर्शन, २. शाण्डिल्य भक्ति दर्शन और ३. आगिरस्य मध्य मीमांसा दर्शन (देवी मीमांसा दर्शन) जो क्रमश देवर्षि नारद, महर्षि शाण्डिल्य और महर्षि अंगिरा द्वारा रचित हैं।

देवर्षि नारद द्वारा रचित चौरासी सूत्रों का एक ग्रंथ है। जो नारद भक्ति सूत्र, प्रेम सूत्र और नारद भक्ति दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। यदि केवल भक्ति का ज्ञान प्राप्त करना है, तो नारद भक्ति सूत्र के समान सरल और संक्षिप्त कोई अन्य दर्शन-शास्त्र नहीं है। इसमें भक्ति की व्याख्या, महत्ता, लक्षण, साधन, भक्ति का स्वरूप, भक्ति के नियम, फल आदि की चर्चा की गयी है। इसलिए इस लेख में हम इतने महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘नारद भक्ति सूत्र’ के बारे में विस्तार से जानेंगे।

नारद भक्ति सूत्र के रचयिता

नारद भक्ति सूत्र देवऋषि नारद द्वारा रचित है। नारद जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र है। उन्होंने अपने पिता से शिक्षा ली है और भगवान नारायण के भी शिष्य है और वे नारायण के अनन्य भक्त है। उनके लिए भागवत पुराण ७.६.२८ में कहा गया - ‘नारदाद्देवदर्शनात्’ अर्थात् “भगवान का दर्शन करानें वाले देवर्षि नारद!"। अतः यह कहनें में संकोच नहीं है कि “जिसे देवर्षि नारद जी मिलते हैं, उसे भगवान का दर्शन कराते हैं"। जब प्रह्लाद जी को नारद मिले, तो उन्होंने भगवान नरसिंह को देखा और जब वे कंस के पास गए, तो उन्होंने श्री कृष्ण को देखा।

वर्तमान समय में, जहाँ मनुष्यों की आयु स्वल्प हैं, वहाँ नारद भक्ति सूत्र का महत्व और बढ़ जाता है। क्योंकि अन्य भक्ति दर्शन से नारद भक्ति सूत्र के सूत्रों को समझना सरल है, जिससे वर्तमान कलियुग के मनुष्य सरलता से ग्रहण कर सकते हैं। भक्ति के आचार्य, ब्रह्मा के पुत्र और भगवन नारायण के भक्त देवऋषि नारद जी ने ८४ सूत्रों में भक्ति के विषय पर अपनी बात बहुत ही सरलता से रखी है। प्रश्न मन में उठ सकता है कि नारद भक्ति सूत्र के रचिता नारद जी है इसका क्या प्रमाण? तो इस पर आगे इस लेख में हमें चर्चा किया है।

नारद भक्ति सूत्र की रचना

नारद भक्ति सूत्र में कुल चौरासी सूत्र है। लेकिन नारद जी ने इसे एक ही अध्याय में लिखा, जिसे आप “भक्ति अध्याय” कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में, नारद भक्ति सूत्र में कोई अध्याय नहीं है। किन्तु, जिन्होंने इस पर भाष्य लिखा उन्होंने ८४ सूत्रों को अलग-अलग अध्याय में बाट दिया है। किसी ने १८ अध्याय में तो किसी ने १६ अध्याय में।

वैसे नारद भक्ति सूत्र की रचना कब हुई? इसका किसी को ज्ञात नहीं है। इस कारण से समाज में कुछ लोग इसका विरोध करते हैं और इसे प्रमाणिक नहीं मानते हैं। यद्यपि वैष्णव सम्प्रदाय और कुछ अन्य सम्प्रदाय इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।

नारद भक्ति सूत्र पर भाष्य

नारद भक्ति सूत्र पर अनेकों लोगों ने टीकाएँ (भाष्य) लिखी हैं, इसलिए इसके अनेक नाम भी है। जिन्होनें “नारद भक्ति सूत्र” का जो सार समझा, वही नाम रख दिया। सबसे प्रचिलित नाम नारद भक्ति सूत्र, प्रेम सूत्र, प्रेम दर्शन और नारद भक्ति दर्शन है। इनमें भी नारद भक्ति सूत्र और नारद भक्ति दर्शन सबसे प्रचिलित है। तो इसका यह नाम क्यों है? उसको को एक-एक करके समझते है।

नारद भक्ति सूत्र

इसका नाम नारद भक्ति सूत्र क्यों है? इसके लिए, इसके एक-एक शब्दों पर विचार करे। सूत्र - कम शब्दों वाला, सारस्वरूप, निरन्तरता से लिये हुए को सूत्र कहते हैं। नारद भक्ति सूत्र में, कम शब्दों में भक्ति का सार निरन्तर धरा में लिखा गया है। उद्धरण के लिए -

कथादिष्विति गर्गः।
- नारद भक्ति सूत्र १७

अर्थात् :- श्रीगर्गाचार्य के मतानुसार भगवान की कथा में अनुराग होना भक्ति है।

नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।
- नारद भक्ति सूत्र १९

अर्थात् :- देवर्षि नारद के मत में, अपने सब कर्मों को भगवान को अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होने पर परम व्याकुल होना ही भक्ति है।

नारद भक्ति सूत्र को नारद जी ने लिखा है इसका प्रमाण नारद भक्ति सूत्र में ही है। नारद भक्ति सूत्र में दो बार “नारद” शब्द आता है। प्रथम बार तब आता है जब - नारद भक्ति सूत्र के १६,१७ और १८ के सूत्रों में, भक्ति पर क्रमशः वेदव्यास, गर्गाचार्य और शाण्डिल्य ऋषि का क्या मत है; यह बताया गया। उसके बाद १९ सूत्र में - ‘नारदस्तु’ “देवर्षि नारद के मत में” यहाँ आता है। इसके बाद दूसरी बार ८४ सूत्र में आता है। वह सूत्र इस प्रकार है -

य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रध्दत्ते स प्रेष्ठं लभते स प्रेष्ठं लभत इति॥
- नारद भक्ति सूत्र ८४

अर्थात् :- जो इस नारदोक्त शिवानुशासन में विश्वास और श्रद्धा करते हैं वे प्रियतम (भगवान) को पाते हैं, वे प्रियतम को पाते हैं।

यानी, ‘नारदोक्त’ देवऋषि नारद जी कहते है कि जो इस मेरे कहे हुए। इससे स्पस्ट होता है की यह ग्रंथ नारद जी द्वारा रचित है। लिपिबद्ध किसने किया? इस पर आप-हम अपनी बुद्धि लगा सकते है। किन्तु, यह नारद जी ने लिखा यह स्पस्ट है। अतः यह देवर्षि नारद द्वारा भक्ति का सूत्र है, इसलिए इसे नारद भक्ति सूत्र कहते है।

नारद भक्ति दर्शन

नारद भक्ति सूत्र को नारद भक्ति दर्शन भी कहते है, क्योंकि यह दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाला प्रमाणिक ग्रंथ है। इसमें भक्ति के विषय को तर्क द्वारा भी बताया गया है। यह ग्रंथ पथ प्रदर्शक यानी भक्ति मार्ग दिखने वाला है। इसलिए इसे नारद भक्ति दर्शन कहा जाता हैं।

प्रेम सूत्र और प्रेम दर्शन

इस ग्रन्थ में ५१ से ५५ तक जो प्रेम के विषय में बताया गया है, वो तो अनिर्वचनीय है। फिर इसमें भक्ति को प्रेमरूपा कहा गया है। इसलिए इसे प्रेम सूत्र और प्रेम दर्शन के नाम से जाना जाता है।

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