सबकी कामना अलग-अलग क्यों है?

क्यों सबकी कामना अलग-अलग है?

पहले आप इस पृष्ठ को पढ़ लीजिये:- ❛कामना क्या है, उसके प्रकार, कहाँ रहती है?❜ संसार में सबकी कामनाएं अलग-अलग है। सब लोग अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। जैसे किसी को धन की कामना इतना अधिक है कि पत्नी-पति पुत्र कोई भी हो उनको कोई मतलब नहीं, उसको धन चाहिए। इसी प्रकार किसी को मान-सम्मान, खाने-पिने की, किसी को कुछ तो किसी को कुछ। तो प्रश्न यह है कि यही शरीर सबके पास है, परन्तु सबकी कामना अलग-अलग है, ऐसा क्यों?

एक व्यक्ति के समक्ष दूध रखों पिने के लिए वो सहर्ष पियेगा, परन्तु ऐसे भी व्यक्ति है जो नहीं पियेंगे। तो देखिये! वही शरीर, इन्द्रिय, मन है दोनों में व्यक्ति के पास, लेकिन एक को अच्छा लग रहा है और दूसरे को ना पसंद है। तो ये अलग-अलग कामनाएं क्यों दिखाई पड़ रही है। एक ही कामना सब को होनी चाहिए क्योंकि दोनों के शरीर, इन्द्रिय, मन एक ही तत्व से बने है - माया से।

अतएव इससे ऐसा लगता है कि सबकी कामना लग-अलग है इसलिए सबका कारण भी अलग-अलग होगा। परन्तु ऐसा नहीं है। एक ही कारण है! वो है 'आसक्ति'। जिस व्यक्ति को जिस वस्तु में आसक्ति हो चुकी है, उसको उसी वस्तु /व्यक्ति की कामना होती है। अब सबकी आसक्ति अलग-अलग वस्तु / व्यक्ति में है इसलिए सबकी कामना अलग-अलग है। हमें हमारे भाई, बेटी-बेटा, माता-पिता, भोजन में आसक्ति है, अतएव इन्ही के प्रति हमारी कमना जागृत होती है। जैसे एक व्यक्ति को खीर में आसक्ति हुई है अतएव उसको खीर खाने की कामना उत्पन्न होती है। एक व्यक्ति अपनी प्रेमिका/प्रेमी में आसक्त है, अतएव उसको पाने की-मिलने की कामना होती है।

चुकी हमें हमारी प्रेमिका/प्रेमी में आसक्ति है इसलिए पड़ोसी को उससे मिलने की कामना नहीं होगी। अगर हो रही है इसका मतलब की किसी प्रकार की आसक्ति उसे भी है। वो आसक्ति का भाव अलग हो सकता है जैसे कोई पुत्र-पुत्री, मित्र-सखी आदि भाव से आसक्त हो। इसलिए जिसकी जहाँ आसक्ति होगी, उसी की कामना होगी और जिसकी कामना होगी उसकी पूर्ति में आनंद (सुख) मिलेगा, और लोभ उत्पन्न होगा। कामना की पूर्ति नहीं हुई तो दुःख मिलेगा, और क्रोध उत्पन्न होगा। लेकिन आसक्ति भी सबकी अलग-अलग है। अगर एक वस्तु-व्यक्ति में आसक्ति होती तो हम बोलते की ये स्वभाव (नेचर (प्रकृति)) है। अतएव अगर ये स्वभाव नहीं है इसका मतलब विषयों में आसक्ति हमारे द्वारा बनायीं हुई है।

अस्तु, तो सारांश यह है कि जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु/व्यक्ति में बार-बार चिंतन किया एवं उसमें सुख माना। सुख माना, उसे मिला नहीं। जितना वो उस वस्तु-व्यक्ति का चिंतन किया, उतनी आसक्ति होगी। और जितनी आसक्ति होगी, उसकी पूर्ति के बाद उतना ही सुख मिलेगा, और लोभ भी उतना होगा और उसके न मिलने पर उतना ही क्रोध होगा।

अतएव अलग-अलग विषयों (व्यक्ति या वस्तु) में सुख मानने से, उनमें हमारी आसक्ति हो जाती है। फिर आसक्ति के कारण हम उन विषयों की कामना करते है। अगर वो कामना पूरी हुई तो सुख मिलता है और नहीं पूरी हुयी तो दुःख मिलता है।

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