क्या प्रारब्ध (भाग्य) अनुसार ही हमारे कर्म होते हैं?

क्या भाग्य अनुसार ही हमारे कर्म होते हैं?

प्रारब्ध (भाग्य) कैसे बनता है? पहले ये समझ लेते है। प्रारब्ध केवल हमारे कर्मों से बनते है। हम है ऐसा नहीं कर सके कि हमारे मन में आये तो अच्छा कर्म भोगे और बुरा कर्म न भोगे। फल तो भोगना पड़ेगा।

१. संचित कर्म।
२. प्रारब्ध कर्म।
३. क्रियमाण कर्म।

१. संचित कर्म:- संचित कर्म अनंत मात्रा का होता है। ये अनंत जन्मों के पाप-पुण्य दोनो का हिसाब है।

२. प्रारब्ध कर्म:- संचित कर्म में से, थोड़ा सा अंश मात्र को, प्रारब्ध कर्म कहते हैं। यानी हमारे जन्म से पहले हमारे संचित कर्म में से थोड़ा सा अंश मात्र को निकल कर हमारा भाग निर्धारित (निश्चित) किया जाता हैं। इस जन्म के रूप में फल रूप में मिलता है।

हमने पूर्व जन्म में जो कर्म किया है वो जड़ है। जड़ रूपी कर्म अपने आप फल नहीं बन सकता। इसलिए सर्वज्ञ भगवान हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखते है, और उसे अनुसार फल देते है। जैसे हमने अच्छे कर्म किया, तो हमें अच्छे घर मिले गया। किसी महापुरुष से मिला देगे, फिर उसके संग से हम क्रियमाण कर्म करेंगे।

३. क्रियमाण कर्म:- किसी महापुरुष का संग मिल गया, और हम उस महापुरुष के बताये रस्ते पे चल पड़े। अब जो हम चले ये हमारा वर्तमान क्रियमाण कर्म। क्रियमाण का अर्थ ही है वो जो वर्तमान में किया जा रहा है। इस प्रकार क्रियमाण कर्म का अर्थ है वर्तमान में किया जाने वाला कर्म।

संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म के सिद्धांत से ही सिद्ध होता है कि हम कर्म करने में स्वतंत्र है। भगवान तो हमारे कर्म का फल देता है। अतएव सब कुछ भाग्य अनुसार नहीं होता।

भाग्य (प्रारब्ध कर्म) हमारे ही किये गए कर्मों का फल है। अतएव भाग्य में जो है उसे तो भोगना ही पड़ेगा। यह तो हमने बुरे कर्म करने से पहले सोचना चाहिए कि मेरे जब बुरे कर्मों का फल मिलगा तब क्या होगा। परन्तु तब हम नहीं सोचते, अब जब अपने ही किये गए कर्मों का फल भोगना पड़ रहा है तब ऐतराज क्यों करते है?

भाग्य का रहस्य तो इतना है कि हम अपना क्रियमाण कर्म करते है, भाग्य अगर अच्छा आता है तो क्रियमाण कर्म करने में अधिक सहायता मिल जाती है। और अगर भाग्य बुरा आता है तो क्रियमाण कर्म करने में तोड़ी बाधा होती है। परन्तु, भाग्य कभी भी हमारे क्रियमाण कर्म को पूर्ण रूप से नहीं रोक सकती। सौभाग्य या दुर्भाग्य केवल कुछ दिन, महीने या साल का होता है, यह हमारे कर्म पर निर्भर करता है कि हमने कितने अच्छे कर्म किये थे। जब हम अपने सौभाग्य या दुर्भाग्य को भोग कर खत्मं कर देते है तो भाग्य ख़तम हो जाता है।

इसलिए वेदों ने ये बतया है की जीव को अपने क्रियमाण कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए। अगर अच्छा भाग्य आये तो बहुत तेजी से उन्नति करेगा और दुर्भाग्य आया तो क्रियमाण कर्म अधिक करना चाहिए जिससे वो उन्नति करता रहे। चुकी जीव भाग्य को जनता नहीं, इसलिए भाग्य पर विचार ही नहीं करना चाहिए।

अगर प्रारब्ध (भाग्य) अनुसार ही हमारे कर्म होते! तो प्रारब्ध आया कहाँ से आया। अगर आज हम कर्म नहीं कर सकते, तो पूर्व में भी नहीं कर सकते। और जब कर्म ही नहीं कर सकते तो प्रारब्ध कहाँ से बन गया। अतएव प्रारब्ध हमारे ही किये गए अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा है।

अस्तु, क्रियमाण कर्म को प्रारब्ध नहीं रोक सकता। क्रियमाण कर्म करने का अधिकार हमें स्वत्रांत दिया गया है, लेकिन फल हमने भोगना पड़ेगा हैं। वह फल हमारे कर्म अनुसार ही मिलते है।

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