क्रोध क्यों आता है? क्या क्रोध पर नियंत्रण कर सकते हैं?

क्रोध क्यों उत्पन्न होता है

क्रोध क्यों उत्पन्न होता है?

क्रोध का जन्म कामना (इच्छा) से होता है। जैसे, एक पिता अपने पुत्र से कहता है, "बेटा एक गिलास पानी ले आओ!" वह उठा और पानी लादिया। तो पिता जी कहते है, "क्या बात है! शाबाश बेटा, तू तो श्रवण कुमार है।" एक बार फिर पिता अपने पुत्र से कहता है, "बेटा वो पुस्तक ले आओ।" अब वह (पुत्र) वही बैठा रहा, पिता ने फिर कहा, "बेटा उस पुस्तक को ले आओ।" अब भी वहीं बैठा रहा, पिता ने फिर कहा, "बेटा वो पुस्तक ले आओ।" अब भी वहीं बैठा रहा। तो पिता ने कहा, "नालायक! राक्षस पैदा हुआ है" तो देखिये, जब पिता की कामना पूर्ति हुई तो उन्होंने कहा "श्रवण कुमार" और जब कामना की आपूर्ति (कामना की पूर्ति नहीं की) तो वही पुत्र नालायक और राक्षस हो गया और पिता को क्रोध आया।
तो ये जितना भी किसी व्यक्ति को क्रोध उत्पन्न होता है, उसके कामना की आपूर्ति (कामना की पूर्ति नहीं हुई या अभाव) में क्रोध आता है। 'जितना अधिक कामना की आपूर्ति उतना अधिक क्रोध।' या इसी बात को इस प्रकार से कहे 'जितना अधिक स्वार्थ, उतना ही स्वार्थ की आपूर्ति में क्रोध।' पिता का स्वार्थ था, बैठे-बैठे पुत्र से पुस्तक मिलजाए। अगर स्वार्थ सिद्ध होता तो "श्रवण कुमार" और स्वार्थ सिद्ध नहीं होता तो "नालायक! राक्षस पैदा हुआ है।"
अतएव जिसकी जहाँ आसक्ति होगी, उसीकी कामना होगी और जिसकी कामना होगी उसकी पूर्ति में आनंद (सुख) मिलेगा,और लोभ पैदा होगा। कामना की पूर्ति नहीं हुई अर्थात आपूर्ति तो दुःख मिलेगा, और क्रोध पैदा होगा।
तो कामना की पूर्ति नहीं होती तभी क्रोध उत्पन्न होता है। अतएव अगर आपको क्रोध आये तो ये समझियेगा की हमने उस व्यक्ति विशेष से कुछ कामना की थी और उस व्यक्ति ने हमारे कामना की पूर्ति नहीं की इसलिए हमें क्रोध आया। अतएव क्रोध करने का मूल कारण कामना ही है। आपको गूगल पर अनेक लेख मिलेंगे उनमें से जो महत्वपूर्ण बातें वे लोग लिखते है, उन पर भी चर्चा करते है, वो कहते है,
जैसे ही आप समझते हैं कि आप गुस्से में हैं, एक ब्रेक लें
गहरी सांस लें।
एक "अच्छी जगह" को याद करें।
अपने से सकारात्मक बातें करने का अभ्यास करें।
ये सब निरर्थक है, "गहरी सांस लें। एक 'अच्छी जगह' को याद करें। अपने से सकारात्मक बातें करने का अभ्यास करें।" क्या होगा इन सब उपायों से? आपका मन आपके साँसों की ओर चला जायेगा, आपका मन सकारात्मक बातें सोचने में चला जायेगा।आपने बस अपने मन का ध्यान हटा दिया। लेकिन जब भी आपका मन उस बात को सोचेगा जिस वजह से आपको क्रोध आया तो आप फिर क्रोधित हो जायेंगे। ये तो ऐसी बात हो गई, की एक पुरुष एक स्त्री से प्रेम करता है। लेकिन स्त्री उससे प्यार नहीं करती, तो पुरुष उससे भुलाने का प्रयत्न करता है। परन्तु, जब वह स्त्री उसके सामने आती है, तो पुरुष के मन में प्रेम फिर से उमड़ पड़ता है।
अस्तु, क्रोध का जन्म कामना (इच्छा) से होता है, और क्रोध पर नियंत्रण करना है तो कामना करना बंद करना पड़ेगा। क्या करें कि क्रोध (गुस्सा) नहीं आये, कामनाओं का त्याग करें। अवश्य पढ़े ❛किसी के बात का बुरा और अच्छा नहीं मानना चाहिए।❜

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