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शिवजी का विवाह और विवाह की तैयारी - शिव विवाह कथा

हमने पिछले लेख में भगवान शिव जी के बारात के आगमन में क्या हुआ? - शिव विवाह कथा का विस्तार से विवरण किया है अबे आगे की कथा बताने जा रहे है।

विवाह की तैयारी

शिव जी ने बाद में लोगों के कहने पर दूल्हे की तरह वस्त्र धारण किये। मुनियों ने हिमवान्‌ को लग्न पत्रिका सुनाई और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुला भेजा। सभी देवता आये सबको योग्यता अनुसार आसन दिए। वेद की रीति से वेदी सजाई गई और स्त्रियाँ सुंदर श्रेष्ठ मंगल गीत गाने लगीं। वेदिका पर एक अत्यन्त सुंदर दिव्य सिंहासन था, जिसकी सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी के द्वारा बनाया हुआ था।
ब्राह्मणों को सिर नवाकर और अपने स्वामी श्री रघुनाथजी का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गए। मुनीश्वरों ने पार्वतीजी को बुलाया। सखियाँ श्रृंगार करके उन्हें ले आईं। पार्वतीजी के रूप को देखते ही सब देवता मोहित हो गए। तुलसीदास जी कहते है कि संसार में ऐसा कवि कौन है, जो उस सुंदरता का वर्णन कर सके?
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥
भावार्थ:-पार्वतीजी को जगदम्बा और शिवजी की पत्नी समझकर देवताओं ने मन ही मन प्रणाम किया। (तुलसीदास जी मर्यादा का पालन करे के कारण से माँ पार्वती की सुंदरता का और बखान नहीं किया इसलिए उन्होंने लिखा जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥) भवानीजी सुंदरता की सीमा हैं। करोड़ों मुखों से भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती।

शिवजी का विवाह प्रारम्भ

मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे।
हम लोग यह सोचते है कि तुलसीदास ने ऐसा क्यों लिखा गणेशजी तो शिव-पार्वती की संतान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गए? इस प्रश्न के समाधान के लिए पढ़े शिव-पार्वती विवाह में गणेश जी की पूजा का सच क्या है?
वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवाई। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी शिवजी को समर्पण किया। जब शिवजी ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब सब देव बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे। अनेकों प्रकार के बाजे बजने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। शिव-पार्वती का विवाह हो गया। दासी, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकार की चीजें, अन्न तथा सोने के बर्तन गाड़ियों में लदवाकर दहेज में दिए, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।

बारात की विदाई

बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा- हे शंकर! आप पूर्णकाम (जिसकी कोई भी कामना न बचे वः पूर्णकाम) हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? यह कहकर वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गए। फिर प्रेम से मैना जी ने शिवजी से कहा - "हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान प्यारी है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइएगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए। शिवजी ने अपनी सास को समझाया।

माता मैना ने पार्वती को सीख दी

फिर माता ने पार्वती को बुला लिया और गोद में बिठाकर यह सुंदर सीख दी - हे पार्वती! तू सदा शिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया। मैना बार-बार मिलती हैं और पार्वती के चरणों को पकड़कर गिर पड़ती हैं। भवानी सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर अपनी माता के हृदय से जा लिपटीं।
पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिए। पार्वतीजी मुड मुड कर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गईं। महादेवजी सब याचकों को संतुष्ट कर पार्वती के साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाश में सुंदर नगाड़े बजाने लगे।
तब हिमवान्‌ (पार्वती के पिता) अत्यन्त प्रेम से शिवजी को पहुँचाने के लिए साथ चले। शिवजी ने बहुत तरह से उन्हें संतोष कराकर विदा किया। पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आए और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाया। हिमवान ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की। जब शिवजी कैलास पर्वत पर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकों को चले गए।

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