शिव ने समाधि खोली, सती जी का दक्ष के यज्ञ में जाना - सती शिव की कथा

सती शिव की कथा
हमने अपने पिछले लेख में बताया शिवजी द्वारा सती का त्याग और शिवजी की समाधि - सती शिव की कथा अब उसके आगे क्या हुआ यह बताने जा रहे है।

शिव ने समाधि खोली

सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि खोली। शिवजी जब रामनाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने सती को बैठने के लिए सामने आसन दिया। फिर शिव भगवान हरि की रसमयी कथाएँ सती जी से कहने लगे।

दक्ष को अहंकार

जब सती को शिव हरि की कथा सुना रहे थे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्मा ने सब प्रकार से योग्य देख-समझकर दक्ष को प्रजापतियों का नायक बना दिया। जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया, तब उनके हृदय में अत्यंत अभिमान आ गया। तुलसीदास कहते है कि जगत् में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो।

दक्ष का निमन्त्रण

दक्ष ने सब मुनियों, किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व, सब देवता और भगवान को बुला लिया। दक्ष का निमंत्रण पाकर - किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेव को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले।
इसी वक्त शिव जी सती को हरि कथा सुना रहे थे। तभी सती ने विमानों में देवताओं को जाते देखा। तभी सती ने शिव से उनके जाने का कारण पूछा, तब शिव ने सब बातें बतलाईं। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेव मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ।

सती जी का दक्ष के यज्ञ में जाना

सती मनोहर वाणी से बोलीं हे प्रभो! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो, हे कृपाधाम! मैं आदर सहित उसे देखने जाऊँ। फिर शिव ने कहा - तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आई, पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है; किंतु हमारे बैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया।
शिव ने बहुत प्रकार से समझाया, पर सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। फिर शिव ने कहा कि यदि बिना बुलाए जाओगी, तो हमारी समझ में अच्छी बात न होगी। किंतु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब महादेव ने अपने मुख्य गणों को साथ देकर उनको बिदा कर दिया। भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँची, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता ही आदर से मिली। बहनें बहुत मुस्कुराती हुई मिलीं। तब सती ने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजी का बैठने का स्थान दिखाई नहीं दिया।
पति परित्याग का दुःख सती के हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान्‌ दुःख इस समय पति अपमान के कारण। यद्यपि जगत में अनेक प्रकार के दारुण दुःख हैं, तथापि, जाति अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया-बुझाया।