भक्त प्रह्लाद कौन थे? इनके जन्म और जीवन की कथा।

भक्त प्रह्लाद
भक्त प्रह्लाद को कौन नहीं जानता, प्रह्लाद निश्काम भक्तों की श्रेणी में आते है। निश्काम का अर्थ है - जो अपने सुख के लिए कार्य न करे, वो केवल अपने स्वामी के सुख के लिए कार्य करे। विज्ञान कहता है की माँ के गर्भ में स्थापित शिशु के बुद्धी विकास में माँ का पूर्ण योगदान होता है, माँ के जैसे विचार होंगे शिशु का विकास उसी स्तर में होता है।

नारद जी का भक्त प्रह्लाद को इंद्र से बचाना

जैसा की कथा में बताया गया है कि महान दैत्य हिरण्यकशिपु (जिसे हिरण्यकश्यप से भी जाना जाता है) की पत्नी कयाधु जब गर्भावस्था में थीं। तब हिरण्यकशिपु घोर तप कर रहा था। जिसके डर से देवराज इंद्र डरने लगा, उसने कयाधु को मारने के लिए उसको बंधक बना के इंद्रलोक ले जा रहा था, तभी देवऋषी नारद जी ने इंद्र को देखा। नारद जी ने कहा - "हे देवराज इंद्र! आप यह क्या करने जा रहे है? आपको पता है! कयाधु अभी गर्भावस्था में है और उसके गर्भा में एक महान भक्त है। आप उसकी हत्या करेंगे?" नारद जी के ऐसे वचन सुनकर इंद्र डर गया, उसे नारद जी से कहा "छमा कर मुनिवर! मुझसे भूल हो गयी है।"

नारद जी को कयाधु को भक्ति का उपदेश देना

तब नारद जी ने हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु को गर्भावस्था में ही अपने आश्रम लेके आये। और नारद जी ने भक्ति का उपदेश दिया। कयाधु नारद जी के पास तबतक रही जबतक हिरण्यकशिपु ने तपस्या ख़त्म नहीं कर ली।
जैसा की हम जानते है जिसका जैसा पात्र होता है उसमे तबतक ज्ञान का ठहराव होता है। जैसे आग में लोहा जबतक रहता है तबतक वो गर्म रहता है, जैसे ही निकालो वैसे ही वो लोहे की गर्मी कम होने लगती है और कुछ देर बाद लोहा ठंडा होजाता है। ऐसे ही प्रह्लाद की माता कयाधु का अंतःकरण (मन-बुद्धि) था। उसने नारद का उपदेश तो सुना लेकिन बाद में सब भूल गयी। लेकिन माँ के पेट में प्रह्लाद जी थे उन्होंने सारा ज्ञान सुन लिया और मान लिया। इसलिए जब प्रह्लाद पैदा हुए तो वो जनमजात ही भगवान विष्णु के भक्त थे। प्रह्लाद से पहले भी कयाधु को चार पुत्र थे परन्तु उनका जन्म महल में ही हुआ था, वो चार पुत्र दानव प्रवत्ती के हुये। नारद जी के आश्रम में ही भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ। वहाँ ऋषियों, संतो का संग पाकर छोटी आयु में प्रह्लाद ने वेद भक्ति इत्यादि का ज्ञान अर्जित कर लिया।
एक ध्यान देने वाली बात है, यह प्रह्लाद नित्य सिध्य महापुरुष है। यह लीला में प्रह्लाद जी नारद जी से ज्ञान अर्जित कर रहे है। परन्तु वास्तविकता यह ही की प्रह्लाद जी को हमेसा से भक्ति का ज्ञान था।

हिरण्यकशिपु तपस्या ख़त्म कर वापस आया

हिरण्यकशिपु अपनी तपस्या ख़त्म कर लिया। तब कयाधु प्रह्लाद संग महल में आयी। पिता हिरण्यकशिपु ने अपने छोटे पुत्र को एक दिन पूछा की तुम्हे क्या करना पसंद है। तब प्रह्लाद बोले की मुझे हरि की भक्ति करना पसंद है। हिरण्यकशिपु को यह सुनकर क्रोध आया, क्योंकि उसके भाई हिरण्याक्ष को विष्णु ने मारा था। वो प्रह्लाद को दैत्यों के गुरुकुल में भेजा। प्रह्लाद को बहुत समझाया गया की वह हरि भक्ती का त्याग करदे पर वो अपने संकल्प में स्थिर रहे।

गुरुकुल व घर पर प्रह्लाद का आचरण

हिरण्यकशिपु ने गुरु के पुत्रों को बुलाया, शुक्राचार्य के दो पुत्र शंद और अमर्क थे। हिरण्यकशिपु ने कहा गुरु पुत्रों से की प्रह्लाद को लेजाओ इसको पढ़ाओ समझाओ, साम दाम भेद जो राजाओं का जो लक्ष है उसका ज्ञान कराओ। प्रह्लाद पढ़ने गए। उनको पढ़ना क्या था, वह तो गर्भ में ही सिद्ध महापुरुष थे। लेकिन फिर भी लीला में जो गुरु पढ़ाते है वह प्रह्लाद बेईमानी से सुना देते थे। लेकिन भागवत ७.४.३७ कहती है "कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम्" की प्रह्लाद को छोटी आयु में कृष्ण (भगवान) रूपी ग्रह लग गया था। इसलिए वह जगत को कुछ समझते ही नहीं थे, संसार भी कोई तत्व है, यह समझते ही नहीं थे। मां हो भाई हो बेटा हो पति हो बीबी हो ऐश्वर्य हो संसार का, यह सब उनको शून्य लगता था। प्रह्लाद को सदा श्री हरि के प्रेम में विभोर रहते थे। भागवत ७.४.४० "क्वचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह" कभी-कभी इतने विभोर हो जाते थे श्री हरि प्रेम में, कि वह भूल जाते थे कि मैं प्रह्लाद हूँ। अपने आप को भगवान विष्णु मान \लेते थे और वैसा ही व्यवहार करने लगते थे।
अनेक प्रकार से हिरण्यकशिपु भगवना विष्णु की भक्ति करने से मना किया परन्तु वो नहीं माना। अधिक जानने के लिए पढ़े कैसे हिरण्यकशिपु ने किया अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का प्रयास।
अंत में पुत्र प्रह्लाद से अत्यंत कुपित होकर हिरण्यकशिपु बोला- "मैं त्रिलोकों का नाथ हूँ। मेरे सिवा कोई अन्य ईश्वर है तो वह कहाँ है?" प्रह्लाद ने उत्तर दिया - "ईश्वर सर्वव्यापी हैं। वे सर्वत्र विराजमान हैं"। (तुलसीदास लिखते है हरि व्यापक सर्वत्र समाना।) हिरण्यकशिपु गरज उठा, उसने कहा कि- "क्या तेरा विष्णु महल के इस स्तंभ में भी हैं?" प्रह्लाद जी बोले - "हाँ, इस स्तंभ में भी भगवान का वास है पुत्र के उत्तर को सुन हिरण्यकशिपु ने मुट्टी बनाकर जोर से स्तंभ (खंभे) पर प्रहार किया। खंभे में दरार पड गयी। उसके भीतर से भगवान नरसिंह (नर + सिंह) के रूप में प्रकट हुए। हिरण्यकशिपु को नाखूनों से उसके सीने को चीर कर उसका वध किया। निष्कलंक भक्त प्रह्लाद के मुख से निकले वचन सत्य सिद्ध हुए।
यही कारण है होली मनाने का की हम भगवान को हर जगह माने। अधिक जानने के लिए पढ़े होली क्यों मानते है? होली मानाने की कथा और वास्तविक कारण? होलिका-दहन क्यों किया जाता हैं?
हिरण्यकशिपु को मारने के बाद नरसिंह भगवान बहुत क्रोध में थे। अंत में सभी देवता लोग आए और नाराजी से प्रार्थना किया कि आप जाएं भगवान कि स्तुति करने के लिए जाये। लेकिन नारद जी ने नरसिंह भगवान का वह क्रोध में स्वरूप देखकर उनके पास जाने की हिम्मत नहीं हुई। इसलिए उन्होंने ब्रह्मा जी को बुलाया। ब्रह्मा जी का भी वही हाल था, फिर ब्रह्मा जी ने लक्ष्मी जी को बुलाया कि लक्ष्मी जी आप जाइए। लेकिन लक्ष्मी जी भी नहीं गई उन्होंने भी कहा कि मुझे इनका यह क्रोध मय स्वरूप नहीं देखा जा रहा है। फिर सभी ने प्रह्लाद जी को कहा कि आप जाइए। प्रह्लादजी गए और भगवान की स्तुति हुई फिर सभी लोगों ने जय हो जय हो जयघोष होने लगे।

प्रह्लाद ने किया अंतिम संस्कार और शादी फिर बच्चे

इसके बाद अंत में नरसिंह भगवान ने प्रहलाद को यह आज्ञा दी कि अपने पिता का अंतिम संस्कार करें और राज्य करें। अस्तु भगवान नरसिंह का यह आज्ञा का पालन प्रह्लाद जी ने किया। उन्होंने अंतिम संस्कार किया, राज्य किया। प्रह्लाद जी ने शादी भी की और उनके पुत्र भी हुए।

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