हिरण्याक्ष कौन था? - वराह अवतार कथा

हिरण्याक्ष
जय और विजय बैकुण्ठ से गिर कर दिति के गर्भ में आ गये। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों की माँ दिति और पिता कश्यप के पुत्र थे। दोनों जन्म से ही आकाश तक बढ़ गये। उनका शरीर फौलाद के समान पर्वताकार हो गया। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बलवान थे, किंतु फिर भी उन्हें संतोष नहीं था। वे संसार में अजेयता और अमरता प्राप्त करना चाहते थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों अपने को तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ मानते थे। हिरण्याक्ष स्वयं विष्णु भगवान को भी अपने से भी तुच्छ मानने लगा।

इन्द्रलोक और वरुण की राजधानी पर हिरण्याक्ष की विजय

हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी जीत ली और धरती को समुद्र में डुबो दिया। वह इन्द्रलोक में पहुँचा और देवताओं को जब उसके पहुँचने की ख़बर मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। राजा इंद्र के न होते हुए, इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी में गया। उसने वरुण के समक्ष उपस्थित होकर कहा, 'वरुण देव, आपने दैत्यों को पराजित करके राजसूय यज्ञ किया था। आज आपको मुझे पराजित करना पड़ेगा। मेरी युद्ध की इच्छा को शांत कीजिए।' हिरण्याक्ष का कथन सुनकर वे बड़े शांत भाव से बोले, 'तुम महान योद्धा और शूरवीर हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहाँ? तुम को तो नारायण के पास जाना चाहिये। वे ही तुमसे लड़ने योग्य हैं।" तभी देवता लोग और ब्रह्मा ने विष्णु जी से हिरण्याक्ष का वध कर के उसके अत्याचार से मुक्त करने की प्राथना की।

नारद ने कहा की

वरुण देव की बात सुनकर हिरण्याक्ष ने देवर्षि नारद के पास जाकर नारायण का पता पूछा। देवर्षि नारद ने उसे बताया कि नारायण इस समय वाराह का रूप धारण कर पृथ्वी को रसातल (पुराणानुसार पृथ्वी के नीचे सात लोकों में से छठा रसातल लोक हैं) से निकालने के लिये गये हैं। इस पर हिरण्याक्ष रसातल में पहुँच गया। वहाँ उसने भगवान वाराह को अपने दाँत पर रख कर पृथ्वी को लाते हुये देखा। उस महाबली दैत्य ने वाराह भगवान से कहा, "अरे जंगली पशु! तू जल में कहाँ से आ गया है? तू इस पृथ्वी को कहाँ लिये जा रहा है? इसे तो ब्रह्मा जी ने हमें दे दिया है। रे अधम! तू मेरे रहते इस पृथ्वी को रसातल से नहीं ले जा सकता। तुम अवश्य ही भगवान विष्णु हो। धरती को रसातल से कहाँ लिए जा रहे हो? यह धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे रख दो। तुम अनेक बार देवताओं के कल्याण के लिए दैत्यों को छल चुके हो। आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे।"

हिरण्याक्ष की मृत्यु

यद्यपि हिरण्याक्ष ने अपनी कटु वाणी से बहुत कुछ कहा, किंतु वराह शांत ही रहे। उनके मन में थोड़ा भी क्रोध पैदा नहीं हुआ। वे वराह के रूप में अपने दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहे। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे चल पड़ा। वह कभी उन्हें निर्लज्ज, कभी कायर और कभी मायावी कहता, पर भगवान विष्णु केवल मुस्कराते रहते। भगवान विष्णु ने धरती को स्थापित करने के पश्चात हिरण्याक्ष की ओर देखा। उन्होंने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा, 'तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग बोलते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। तुम क्यों नहीं मुझ पर आक्रमण करते?' वराह की यह बात सुनकर हिरण्याक्ष उस पर टूट पड़ा। भगवान के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था। उन्होंने दूसरे ही क्षण हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर दूर फेंक दी। हिरण्याक्ष माया से हाथ में त्रिशूल लेकर वराह की ओर झपटा। भगवान वराह ने शीघ्र ही सुदर्शन का आह्वान किया और चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। हिरण्याक्ष अपनी अनेक मायावी विद्या का प्रयोग करने लगा। भगवान विष्णु उसके सभी माया कृत्यो को नष्ट करते जाते। जैसे एक पिता अपने छोटे से बच्चे के साथ खेलता है, वैसे भगवान वराह हिरण्याक्ष के साथ युद्ध कर थे थे। अंत में भगवना वराह ने अपने दांतो से मारा और वो मर गया। और उसे मुक्ति मिली।

वराह अवतार कथा से सिख

भगवान से प्रेम करना भी अच्छा है, बैर करना भी अच्छा है। क्योंकि जो प्रेम करता है और जो बैर करता है, दोनों को माया से मुक्ति मिलती है और भगवान के लोक में जाते है। इसीलिए क्योंकि यह मन का भगवान में लगना को भक्ति कहते है, और भक्ति से ही भगवान मिलते है। तो प्रेम और बैर दोनों में मन उस व्यक्ति (भगवान) में लगता है। लेकिन भगवान से बैर करना यह केवल अवतार कल में ही हो सकता है। और भगवान से प्रेम करना यह हर समय किया जा सकता है।