भगवान वराह अवतार कथा - जन्म, वराह अवतार कारण

भगवान वराह अवतार कारण

वराह अवतार भगवान श्री विष्णु का एक अवतार है। मंत्र:- ॐ वराहाय नमः, ॐ धृतसूकररूपकेशवाय नम:।

भगवान वराह का जन्म कैसे हुआ?

'शाप' शब्द संस्कृत भाषा के 'श्राप' का अपभ्रंश है। जय और विजय ने सनकादिक ऋषियों को बैकुण्ठ लोक के द्वार पर ही रोक लिया था जिसके वजह से उन्हें श्राप मिला जिसके फल स्वरूप जय और विजय को तीन जन्म पृथ्वी पर दैत्य बनना पड़ा। अधिक जानने के लिए पढ़े जय और विजय की कथा।

जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में दोनों दिति और कश्यप के पुत्र हुए। इनके वंश राक्षस कहलाए परंतु, इनके कुल में प्रह्लाद और बलि जैसे महापुरुषों का जन्म भी हुआ। हिरण्याक्ष का अत्याचार बढ़ता जा रहा था, वो यज्ञादिक कर्म पर लोक लगा दिया था और वो स्वर्ग नर्क और मृत्युलोक को जित चूका था। दोनों दैत्य जन्मते ही आकाश तक बढ़ गये। उनका शरीर फौलाद के समान पर्वताकार हो गया। हिरण्याक्ष एक दिन घूमते घूमते वरुण की पुरी में जा पहुँचा। पाताल लोक में पहुँच कर हिरण्याक्ष ने वरुण देव से युद्ध की याचना किया परन्तु वरुण देव ने कहा कि "अरे भाई! अब मुझमें लड़ने का चाव नहीं रहा है और तुम जैसे बलशाली वीर से लड़ने के योग्य अब हम रह भी नहीं गये हैं। तुम को तो विष्णु जी के पास जाना चाहिये।"

तब देवता लोग और ब्रह्मा ने विष्णु जी से हिरण्याक्ष का वध कर के उसके अत्याचार से मुक्त करने की प्राथना की। तब ब्रह्मा ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपने नासिका से वराह नारायण को जन्म (अवतार) दिया।

वरुण देव की बात सुनकर उस दैत्य ने देवर्षि नारद के पास जाकर नारायण का पता पूछा। देवर्षि नारद ने उसे बताया कि नारायण इस समय वाराह का रूप धारण कर पृथ्वी को समुद्र से निकालने के लिये गये हैं। हिरण्याक्ष तुरंत वह गया क्योंकि उसी ने पृत्वी को समुद्र में रखा था। वह तुरंत वह पंहुचा और वहाँ उसने भगवान वराह को पृथ्वी को लेजाते हुये देखा। उस महाबली दैत्य ने वाराह भगवान से कहा, "अरे जंगली पशु! तू जल में कहाँ से आ गया है? मूर्ख पशु! तू इस पृथ्वी को कहाँ लिये जा रहा है? रे अधम! तू मेरे रहते इस पृथ्वी को रसातल (पुराणानुसार पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से छठा रसातल लोक है।) से नहीं ले जा सकता। तू दैत्य और दानवों का शत्रु है इसलिये आज मैं तेरा वध कर डालूँगा।"

हिरण्याक्ष और विष्णु अवतार वराह में युद्ध हुआ और अंत में भगवना वराह ने अपने दांतो से मारा और वो मर गया।

भगवान वराह कारण

भगवान के अवतार के अनेक कारण होते है। जैसे भगवान निराकर और साकार दोनों का लोगों को बोध कराना, दैत्यों से रक्षा, धर्म की पुनः इस्थापना, इत्यादि। हमने अपने लेखों में बतयाया है की भगवान का वास्तविक कारण क्या है, जन्म लेने का।

वराह अवतार कथा से सिख

भगवान से प्रेम व बैर करना अच्छा है। क्योंकि जो प्रेम करता है और जो बैर करता है, दोनों को माया से मुक्ति मिलती है और भगवान के लोक में जाते है। इसीलिए क्योंकि यह मन का भगवान में लगना को भक्ति कहते है, और भक्ति से ही भगवान मिलते है। प्रेम व बैर दोनों में मन उस व्यक्ति (भगवान) में लगता है। लेकिन भगवान से बैर करना यह केवल अवतार काल में ही हो सकता है। और भगवान से प्रेम करना यह हर समय किया जा सकता है।

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