क्या भगवान राम की बहन शान्ता है? - प्रमाण वाल्मीकि रामायण

राम की बहन शान्ता है - प्रमाण वाल्मीकि रामायण
हम आपको वाल्मीकि रामायण के द्वारा बतायेगे की राम की बहन शांता हैं। ऋष्यश्रृंग (श्रृंगी ऋषि) के जन्म, जीवन, शान्ता से विवाह और राजा रोमपाद की कथा को वाल्मीकि जी ने अपने रामायण बालकाण्ड नवम: सर्ग - १.९.२ - २० में संछेप में और विस्तार से बालकाण्ड दस और ग्यारह सर्ग में लिखा है। इसमें राम की बहन शान्ता का प्रकरण है, जिसमे सुमन्त्र जी दशरथ जी को बताते है कि कैसे राजा रोमपाद की वजह से उनके वर्षा नहीं होने के कारण उन्होंने श्रृंगी ऋषि को बुलाया और शान्ता का विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ कर दिया। यह है प्रमाण राम की बहन शान्ता का
धृष्टिर् जयन्तो विजयो सुराष्ट्रो राष्ट्र वर्धनः।
अकोपो धर्मपालः च सुमंत्रः च अष्टमो अर्थवित्॥ १-७-३
भावार्थ - अयोध्या के महाराज दशरथ के आठ कूटनीतिक मंत्रि थे। उनके नाम इस प्रकार है - घृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र जो अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे।
एतत् श्रुत्वा रहः सूतो राजानम् इदम् अब्रवीत्।
श्रूयताम् तत् पुरा वृत्तम् पुराणे च मया श्रुतम्॥ १-९-१
भावार्थ - राजा दशरथ पुत्र के लिए अश्वमेध यज्ञ करने की बात सुनकर सुमन्त्र ने राज दशरथ से एकान्त में कहा - 'महाराज! एक पुराना इतिहास सुनिये। मैंने पुराणमें भी इसका वर्णन सुना है।'
सुमन्त्र जी ने ऋष्यश्रृंग या श्रृंगी ऋषि के बारे में बताते हुए कहा कि
एवम् अङ्गाधिपेन एव गणिकाभिः ऋषेः सुतः।
आनीतोऽवर्षयत् देव शान्ता च अस्मै प्रदीयते॥ १-९-१८
भावार्थ - उनके (श्रृंगी ऋषि के) आते ही इंद्रदेव उस राज्य में वर्षा करेंगे। फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देते।
ऋष्यशृङ्गः तु जामाता पुत्रान् तव विधास्यति। १-९-१९
भावार्थ - इस तरह ऋष्यश्रृंग आपके (दशरथ के) जामाता (दामाद) हुए। वे ही आपके लिए पुत्रों को सुलभ कराने वाले यज्ञ कर्म का सम्पादन करेंगे।
यही श्लोक को मुख्य आधार मानकर शान्ता को राम की बहन बताया जाता है।
अर्थात यहाँ पर अस्पस्ट बोल रहे है सुमन्त्र जी की ऋष्यश्रृंग दशरथ के दामाद हैं। तो दामाद कहने का तात्पर्य यही हुआ कि राजा दशरथ की पुत्री का विवाह श्रृंगी ऋषि से हुआ है और श्रृंगी ऋषि की पत्नी शान्ता है। अस्तु, तो यही आधार को मानकर राम की बहन शांता को कहा जाता है और यह बात सत्य भी है कि राम की बहन शांता थी। लेकिन तुलसीदास जी ने यह प्रकरण को रामचरितमानस में नहीं लिखा है।