संध्या क्यों करते हो? जब भगवान् का स्मरण करने से सब पाप नष्ट हो जाता है।

संध्या
जितने भी कर्मकांड करने वाले संसार में पंडित हैं। हम उनसे एक बात पूछना चाहते हैं कि जब वह कर्मकांड प्रारंभ करते हैं, चाहे वह सत्यनारायण की कथा हो, चाहे वह बड़े-बड़े यज्ञ हो, शादी ब्याह हो कुछ भी हो। पहले वे पंडित यजमान से कहते हैं - 'हाथ में पानी लेकर और अपने ऊपर छिड़को' उसी वक्त पंडित जी पद्म पुराण का श्लोक बोलते हैं -
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
भावार्थ:- चाहे अपवित्र हो (कितना भी गंदा हो चाहे वो पाखाना लपेटे हो) या चाहे पवित्र हो (गंगा स्नान करके आया हो) या किसी भी अवस्था में हो, जो पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् (श्री कृष्ण, राम, शिव आदि किसी भी भगवान्) का स्मरण कर ले (मन से) तो अन्दर (अंतःकरण जिसे मन भी कहते है) और बाहर (शरीर) से पवित्र (शुद्ध) हो जाये।
अब संध्या करने वाले पंडित जी इससे आगे संध्या क्यों करते हैं? अरे जब भगवान् का स्मरण करने से अंदर-बाहर दोनों की शुद्धि हो गई तो संध्या क्यों करते हो। कोई भी साधारण पंडित यजमान से यह नहीं कहते कि भगवान्का स्मरण करो। सब बस श्लोक पढ़ने में लगे है। इसके बाद पंडित लोग कहते है - हाथ में पानी लो नासिका के पास लगाओ। फिर मंत्र बोलते है -
ॐ सूर्यश्चमा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु यत्किञ्चिद्दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्य्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥ (तै० आ० प्र० १० अ० २५)
भावार्थ - सूर्य, क्रोध के अभिमानी देवता और क्रोध के स्वामी - ये सभी क्रोधवश किये हुए पापों से मेरी रक्षा करें। रात में मैंने मन, वाणी, हाथ, पैर, उदर और शिश्न (उपस्थ) इन्द्रिय से जो पाप किये हों, उन सब को रात्रिकालाभिमानी देवता नष्ट करें। जो कुछ भी पाप मुझ में वर्तमान है, इसको और इसके कर्तृत्व का अभिमान रखने वाले अपने को मैं मोक्ष के कारणभूत प्रकाशमय सूर्यरूप परमेश्वर में हवन करता हूँ। (अर्थात् हवन के द्वारा अपने समस्त पाप और अहंकार को भस्म करता हूँ) इसका भलीभाँति हवन हो जाय।
ये मंत्र को बोलने के बाद - हाथ को ऊपर उठाओ और बाये तरफ से पानी को फेंक दो। इस मंत्र का संछेप भावार्थ है कि रात भर का जो पाप है वो इस मंत्र से ख़तम हो जाय। सोचिये! जब वो पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् के स्मरण से अंदर बाहर शुद्ध हो गया। तो खाली रात भर के पाप के लिए क्यों बोलते है? अंदर बाहर शुद्ध का मतलब सब कुछ (दिन, रात, अनेक जन्म) सब शुद्ध हो गया। अब पंडित जी शाम को संध्या करते वक्त यह मंत्र बोलते है -
ॐ अग्निश्चमा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु यत्किञ्चिद्दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥
भावार्थ - अग्नि, क्रोध के अभिमानी देवता और क्रोध के स्वामी - ये सभी क्रोधवश किये हुए पापों से मेरी रक्षा करें। मैंने दिन में मन, वाणी, हाथ, पैर, उदर और शिश्न (उपस्थ) इन्द्रिय से जो पाप किये हों उन सब को दिन के अभिमानी देवता नष्ट करें। जो कुछ भी पाप मुझ में वर्तमान है, इसको तथा इसके कर्तृत्व का अभिमान रखनेवाले अपने को मैं मोक्ष के कारणभूत सत्यस्वरूप प्रकाशमय परमेश्वर में हवन करता हूँ। (अर्थात् हवन के द्वारा अपने समस्त पाप और अहंकार को भस्म करता हूँ) इसका भलीभाँति हवन हो जाय।
इस मंत्र का संछेप भावार्थ है कि जो दिन भर पाप किया है वो इस मंत्र से ख़तम हो जाय। ये सब क्या है। कोई सोचता ही नहीं। जब पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् के स्मरण से अंदर बाहर शुद्ध हो गया तो फिर आगे संध्या करने का मतलब क्या है? हम लोग बस लकीर के फकीर बने है।
अस्तु, हम केवल इतना कहना चाहते है कि जो भी पूजा पाठ होता है उसका अर्थ समझे और फिर वो कार्य करे विधिवत।