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दान का महत्व क्या है? - वेद, भागवत और महाभारत अनुसार।

दान का महत्व - वेद, भागवत और महाभारत अनुसार।

दान का महत्व वेद अनुसार

श्रद्धया देयम्‌। अश्रद्धयाऽदेयम्‌। श्रिया देयम्‌। ह्रिया देयम्‌। भिया देयम्‌। संविदा देयम्‌।
- तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली, एकादशोऽनुवाकः
भावार्थ - श्रद्धा से, लज्जा से, भय से भी कोई दान करो तो फल मिलेगा।
कुछ लोग भय से दान करते है। जो भय दान करते है वो अपने परमार्थ की चिंता करते है अर्थात् उनको यह भय रहता है कि अगर हम दान नहीं करेगें तो मरने के बाद क्या होगा? इस बारे में वेदव्यास जी ने महाभारत में कहा

दान का महत्व महाभारत अनुसार

अदतदानात् च भवेत् दरिद्रो दारिद्र्य दोषेण करोति पापम्।
पापप्रभावात् नरकं प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥
- महाभारत
भावार्थ:- दारिद्र्य दोष से पाप होता है। पाप के प्रभाव से नरक में जाता है; फिर से दरिद्री और फिर से पाप होता है।
अर्थात् अगर आपने दान नहीं किया मानव देह में और बल-बच्चों के लिए इकठा कर गये, तो तुम चोर हो।

दान का महत्व भागवत अनुसार

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दंडमर्हति ॥
- श्रीमद्भागवत पुराण ७.१४.८
भावार्थ :- मनुष्य को चाहिए कि उतनी ही संपत्ति के स्वामित्व का दावा करें जितनी शरीर - निर्वाह के लिए पर्याप्त है, किंतु जो इससे अधिक के स्वामित्व की इच्छा करता है, वह चोर है और प्रकृति के नियमों के द्वारा दंडित होने योग्य है।
अर्थात् जितने से तुम्हारा पेट भर जाये कपडे से तन ढक जाये रहने को एक कमरा मिल जाये, इससे अधिक अगर आप चाहते हो या इकठा करते हो। तो भगवान् की सृष्टि के सामान के आप चोर हो, आपको दंड (प्रकृति के नियमों के द्वारा) मिलेगा। आपका इस संसार में कुछ भी नहीं है आप को जीव आत्मा हो, माँ के पेट में भगवान् ने शरीर दिया, यह शरीर भी आपका नहीं यह भी उधार का सौदा है।
भगवान् ने पेट में शरीर दिया और फिर शरीर यहीं धरा लेगें भगवान्। यानि तुम (आत्मा) निराकार माँ की पेट में आये और निराकार ही तुम जाओगें संसार से। अगर किसी ने चोरी कर के बचाया है तो अपराध किया है, दंड मिलेगा। मरने के बाद क्या दंड मिलेगा? अदतदानात् च भवेत् दरिद्रो के अनुसार दरिद्र बनाये जाओगे।
जब दरिद्र बनता है कोई तो आप लोगों में से कोई नहीं जनता है उसका अनुभव। आप सब लोगों को २ रोटी मिलती है। लेकिन जो दरिद्र होता है उसको जब २ रोटी नहीं मिलती (ऐसे विश्व में अरबों लोग है) तो कोई आधी रोटी खा कर संतोष कर लेता है। गावों में ऐसे गरीब आपको मिल जायेंगे कि जब रोटी बनती है तो बटवारा होता है, मानलो १० रोटी बानी है तो पुरुषों को २-२ रोटी देदों, स्त्रिओं को डेढ़-डेढ़ दे दो, बच्चों को आधी-आधी दे दो। बहुत भयानक दुःख है। आज सुखी रोटी खा रहे है, दाल नहीं है।
तो अंत में दरिद्र लोग चोरी करते है, अपराध करते है पेट के लिए। पेट की अग्नि सबसे भयानक है, इसको भुझाने के लिए व्यक्ति बहुत पाप करता है। वासनाओं की अग्नि तो अलग है, लेकिन ये शरीर की भूख रूपी अग्नि है ये पाप करती है। और पाप करने से नर्क फिर दरिद्र बनेगा फिर पाप करेगा। इसीलिए वेद व्यास जी ने कहा 'पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी' ये कर्म चल जाता है।
इसलिए स्मृतियों ने कहा पराशरस्मृति - 'दानमेकं कलौ युगे' भावार्थ कलियुग में एक प्रधान धर्म है मानव का 'दान'। बृहदारण्यकोपनिषद् में कथा है जिसमें देवता, दानव और मानव प्रजापति (ब्रह्मा जी) के पास उपदेश लेने जाते है। तो मानव को प्रजापति (ब्रह्मा जी) ने उपदेश दिया की तुम दान करों इससे तुम्हारा कल्याण होगा। बहुत गरीब हो तो थोड़ा सा दान करो। ज्यों-ज्यों अधिक पैसा आवे अधिक-अधिक दान करो। तुलसीदास जी कहते है
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥१०३ ख॥
- श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड
भावार्थ :- धर्म के चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलि में एक (दान रूपी) चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है ॥१०३ (ख)॥

दान करने से भक्त को क्या लाभ मिलता है?

दान करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, संसार से लगाव (आसक्ति) काम होता है और अहंकार नहीं होता। जरा सोचिये संसार में जिसके पास अधिक धन होता है, कोई ऐसा नहीं है जो अहंकार से बच सके और चुकी अहंकार है इसलिए अहंकार के कारण पाप करता है। एक करोड़ पति पिता के पुत्र की गलती पर पडोसी के लड़के ने झापड़ लगा दिया। पिता के पास जब खबर पहुंची तो वो बोलते है 'उसकी ये हैसियत। मैं करोड़ पति वो मामूली सा चपरासी, उसके लड़के ने हमारे लड़के को झापड़ लगा दिया।' यह देखिये अहंकार पैसे का।
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥७० ख॥
-श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड
भावार्थ :- लक्ष्मी के मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा कौन है जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र बाण न लगे हों ॥७० (ख)॥
अर्थात् कोई विश्व में बचा नहीं जो मदांध न हो जाये अधिक धन से। इसीलिए भगवान् कहते है इसलिए भगवान् कहते है भागवत 'तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्' अर्थात् जिसपर मैं कृपा करता हूँ उसकी तो इसलिए मनुष्य को दान पर विशेष ध्यान देना चाहिये। हम लोग को धन में इतनी आसक्ति है कि जब किसी भिखारी को रुपया दान करते है तो सबसे पहले जेब टटोलते है की सबसे छोटा सिका कौन सा है और सबसे छोटा सिक्का दान करते है। बड़े धन वाले लोग तो यहाँ तक कह देते है छूटा (चेंज) नहीं है, आगे जाओ।सम्पति छीन लेता हूँ। ताकि अहंकार चला जाये।

कोई दारिद्र तो कोई अमीर क्यों होता है?

संसार में एक मामूली पढ़ा लिखा, हाई स्कूल भी पास नहीं है और अरब पति है। उस अरब पति पति के यहाँ बड़े-बड़े पढ़े लिखे लोग नौकरी करते है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा दान के फल के कारण होता है। एक ने खूब दान किया अगले जन्म में करोड़ पति हो गया बिना परिश्म किये। लोग कमाने में दिन भर रात भर लगें है लेकिन घटा हो गया, फायदा भी हुआ लेकिन बहुत कम। और एक तरफ एक व्यक्ति मटरगस्ती करता रहता है और व्यापर भी करता है, और जल्द ही करोड़ पति होजाता है।
यह पूर्व जन्म का किया हुआ दान, इस जन्म में भगवान् उसका फल देते है। हमको अगले जन्म केलिए सोचना चाहिए। और सोच कर दान करना चाहिए। लेकिन? दान चार प्रकार का होता है।

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