बलराम जी का अवतार कैसे हुआ? - भागवत पुराण अनुसार

बलराम जी का अवतार कैसे हुआ भागवत पुराण अनुसार

भगवान बलराम जी ने कैसे अवतार लिया अथवा कैसे जन्म लिया? बलराम जी भगवान शेष जी के अवतार है। यह बात तो सभी जानते है। परन्तु कुछ लोग ऐसा सोचते है कि श्री हरि तथा शेष जी में अंतर है। वास्तव में श्री हरि और शेष जी एक ही है। इसका प्रमाण रामायण में मिलता है। अवश्य पढ़े - राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न विष्णु ही थे - रामायण प्रमाण बलराम जी बलभद्र, हलधर, हलायुध, संकर्षण आदि अनेक नामों से जाने जाते हैं।

भगवान श्री बलराम जी का गर्भ-प्रवेश

हतेषु षट्सु बालेषु देवक्या औग्रसेनिना॥४॥
सप्तमो वैष्णवं धाम यमनन्तं प्रचक्षते।
गर्भो बभूव देवक्या हर्षशोकविवर्धनः॥५॥
- भागवत पुराण १०.२.४-५

भावार्थ:- (श्री शुकदेव जी कहते हैं -) जब कंस ने एक-एक करके देवकी के छः बालक मार डाले, तब देवकी के सातवें गर्भ में भगवान के अंशस्वरूप श्रीशेष जी, जिन्हें अनंत कहते हैं, पधारे। आनन्दस्वरूप शेष जी (बलराम जी) के गर्भ में आने के कारण देवकी को स्वाभाविक ही हर्ष हुआ। परन्तु कंस शायद इसे भी मार डाले, इस भय से उनका शोक भी बढ़ गया।

यह ध्यान रहे कि भगवान के अंश सदा भगवत स्वरूप होते है। भगवान के अंश में वही सब शक्ति है जो भगवान में होती है। अब भगवान के अंश उन शक्तिओं को प्रकट नहीं करना चाहे तो वो उनकी इच्छा। शेषनाग भगवान विष्णु ही बने हैं। हमने आपको अपने लेख में भी बताया है कि भगवान के समस्त अवतार एक हैं।

अस्तु, तब भगवान ने देखा कि मुझे ही अपना स्वामी और सर्वस्व मानने वाले (भक्त) यदुवंशी कंस के द्वारा बहुत ही सताये जा रहे हैं। तब उन्होंने अपनी योगमाया को यह आदेश दिया -

गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलङ्कृतम्।
रोहिणी वसुदेवस्य भार्यास्ते नन्दगोकुले।
अन्याश्च कंससंविग्ना विवरेषु वसन्ति हि॥७॥
देवक्या जठरे गर्भं शेषाख्यं धाम मामकम्।
तत्सन्निकृष्य रोहिण्या उदरे सन्निवेशय॥८॥
अथाहमंशभागेन देवक्याः पुत्रतां शुभे।
प्राप्स्यामि त्वं यशोदायां नन्दपत्न्यां भविष्यसि॥९॥
- भागवत पुराण १०.२.७-९

भावार्थ:- (भगवान ने आदेश दिया- ) देवि! कल्याणी! तुम ब्रज में जाओ! वह प्रदेश ग्वालों और गौओं से सुशोभित है। वहाँ नन्दबाबा के गोकुल में वसुदेव की पत्नी रोहिणी निवास करती है। उसकी और भी पत्नियाँ कंस से डरकर गुप्त स्थानों में रह रहीं हैं। इस समय मेरा वह अंश जिसे शेष कहते हैं, देवकी के उदर में गर्भ रूप से स्थित है। उसे वहाँ से निकालकर तुम रोहिणी के पेट में रख दो, कल्याणी! अब मैं अपने समस्त ज्ञान, बल आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूँगा और तुम नन्दबाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना।

गर्भसङ्कर्षणात्तं वै प्राहुः सङ्कर्षणं भुवि।
रामेति लोकरमणाद्बलभद्रं बलोच्छ्रयात्॥१३॥
सन्दिष्टैवं भगवता तथेत्योमिति तद्वचः।
प्रतिगृह्य परिक्रम्य गां गता तत्तथाकरोत्॥१४॥
गर्भे प्रणीते देवक्या रोहिणीं योगनिद्र या।
अहो विस्रंसितो गर्भ इति पौरा विचुक्रुशुः॥१५॥
- भागवत पुराण १०.२.१३-१४

भावार्थ:- (भगवान ने आदेश दिया- ) देवकी के गर्भ से खींचे जाने के कारण शेष जी को लोग संसार में ‘संकर्षण’ कहेंगे, लोकरंजन करने के कारण ‘राम’ कहेंगे और बलवानों में श्रेष्ठ होने कारण ‘बलभद्र’ भी कहेंगे।' जब भगवान ने इस प्रकार आदेश दिया, तब योगमाया ने ‘जो आज्ञा’, ऐसा कहकर उनकी बात शिरोधार्य की और उनकी परिक्रमा करके वे पृथ्वी-लोक में चली आयीं तथा भगवान ने जैसा कहा था वैसे ही किया। जब योगमाया ने देवकी का गर्भ ले जाकर रोहिणी के उदर में रख दिया, तब पुरवासी बड़े दुःख के साथ आपस में कहने लगे - 'हाय! बेचारी देवकी का यह गर्भ तो नष्ट ही हो गया।

फिर यदूकुल के चंद्रवंश में माता रोहिणी जी से बलराम का अवतार (जन्म) हुआ। उसके उपरांत एक साल बीत जाने पर श्री कृष्ण का जन्म हुआ।

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