बलराम

बलराम जी का जीवन परिचय

बलराम विष्णु के चार रूपों में दूसरा रूप 'संकर्षण' है। संकर्षण बलराम का अन्य नाम है, जो कृष्ण के भाई थे। सामान्यतया बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं और कहीं-कहीं विष्णु के अवतारों में भी इनकी गणना है। क्योंकि बलराम शेष के अवतार है और शेष भगवान् का ही अंश है तथा भगवान् के अंश सदा भगवत स्वरूप होते है इसलिए वे विष्णु के अवतार कहे जाते है। वैसे भी यह सिद्धांत है कि भगवान् के सभी अवतार एक ही है। उनमे अंतर मानना अथवा भेद भाव करना नामापराध है।

बलराम का जन्म

बलराम का जन्म यदूकुल के चंद्रवंश में हुआ। कंस ने अपनी प्रिय बहन देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से विधिपुर्वक कराया। जब कंस अपनी बहन को रथ में बिठा कर वसुदेव के घर ले जा रहा था तभी आकाशवाणी हुई और उसे पता चला कि उसकी बहन का आठवाँ संतान ही उसे मारेगा। कंस ने अपनी बहन को कारागार में बंद कर दिया और क्रमश: छह पुत्रों को मार दिया, सातवें पुत्र के रूप में शेष के अवतार बलराम जी थे जिसे श्री हरि ने योगमाया से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। विस्तार से पढ़े बलराम जी का अवतार कैसे हुआ? - भागवत पुराण अनुसार

बलराम जी के नाम

संकर्षण - जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में भगवान् शेष (बलराम) पधारे। भगवान् ने योगमाया को आज्ञा दी इसलिए योगमाया ने शेष (बलराम) आकर्षित करके नन्द बाबा के यहाँ निवास कर रही श्री रोहिणी जी के गर्भ में पहुँचा दिया। इसलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा।

बलभद्र - बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है।

बलराम जी का जीवन परिचय

बलराम जी बचपन से ही अत्यन्त गंभीर और शान्त थे। श्री कृष्ण उनका विशेष सम्मान करते थे। बलराम जी भी श्रीकृष्ण की इच्छा का सदैव ध्यान रखते थे। ब्रजलीला में शंखचूड़ का वध करके श्रीकृष्ण ने उसका शिरोरत्न बलराम भैया को उपहार स्वरूप प्रदान किया। कंस की मल्लशाला में श्रीकृष्ण ने चाणूर को पछाड़ा तो मुष्टिक बलरामजी के मुष्टिक प्रहार से स्वर्ग सिधारा। जरासन्ध को बलराम जी ही अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी जान पड़े। यदि श्रीकृष्ण ने मना न किया होता तो बलराम जी प्रथम आक्रमण में ही उसे यमलोक भेज देते। बलराम जी का विवाह रेवती से हुआ था। महाभारत युद्ध में बलराम तटस्थ होकर तीर्थयात्रा के लिये चले गये। यदुवंश के उपसंहार के बाद उन्होंने समुद्र तट पर आसन लगाकर अपनी लीला का संवरण किया। श्रीमद्भागवत की कथाएँ शेषावतार बलरामजी के शौर्य की सुन्दर साक्षी हैं।

बलभद्र के सगे सात भाई और एक बहन सुभद्रा थी जिन्हें चित्रा भी कहते हैं। इनका ब्याह रेवत की कन्या रेवती से हुआ था। रेवती बहुत लंबी थीं और बलभद्र जी ने अपने हल से खींचकर इन्हें छोटी किया था।

बलराम जी गदायुद्ध में विशेष प्रवीण थे। दुर्योधन इनका ही शिष्य था। इसी से कई बार इन्होंने जरासंध को पराजित किया था। यदुवंश के उपसंहार के बाद शेषावतार बलराम ने समुद्र तट पर आसन लगाकर अपनी लीला का संवरण किया। यह ध्यान रहे की भगवान् की कभी मृत्यु नहीं होती है। श्री राम की भी मृत्यु नहीं हुई थी। विस्तार से पढ़े भगवान् श्री राम जी की मृत्यु कैसे हुई? राम कथा

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