गोवर्धन पूजा करने का कारण? कृष्ण गोवर्धन लीला - भागवत पुराण

गोवर्धन पूजा - भागवत पुराण

हमने अब तक कृष्ण की इन्द्र यज्ञ नहीं करने का कारण? कृष्ण गोवर्धन लीला - भागवत पुराण अनुसार लेख में विस्तार से सब कुछ बताया की कैसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र तथा देवताओं की पूजा नहीं करने को कहा। अस्तु, तो अब आगे श्री कृष्ण कहते है पिताजी से -

गोवर्धन पूजा करने की विधि - श्री कृष्ण अनुसार

न नः पुरोजनपदा न ग्रामा न गृहा वयम्।
वनौकसस्तात नित्यं वनशैलनिवासिनः॥२४॥
तस्माद्गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः।
य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः॥२५॥
पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पायसादयः।
संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम्॥२६॥
- भागवत १०.२४.२४-२६

भावार्थः - (श्री कृष्ण ने कहा -) ‘पिता जी! न तो हमारे पास किसी देश का राज्य है और न तो बड़े-बड़े नगर ही हमारे अधीन हैं। हमारे पास गाँव या घर भी नहीं हैं। हम तो सदा के वनवासी हैं, वन और पहाड़ ही हमारे घर हैं। इसलिये हम लोग गौओं, ब्राह्मणों और गिरिराज का यजन करने की तैयारी करें। इन्द्र-यज्ञ के लिये जो सामग्रियाँ इकट्ठी की गयी हैं, उन्हीं से इस यज्ञ का अनुष्ठान होने दें। अनेकों प्रकार के पकवान - खीर, हलवा, पुआ, पूरी आदि से लेकर मूँग की दाल तक बनाये जायँ। व्रज का सारा दूध एकत्र कर लिया जाय।’

हूयन्तामग्नयः सम्यग्ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः।
अन्नं बहुगुणं तेभ्यो देयं वो धेनुदक्षिणाः॥२७॥
अन्येभ्यश्चाश्वचाण्डाल पतितेभ्यो यथार्हतः।
यवसं च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलिः॥२८॥
स्वलङ्कृता भुक्तवन्तः स्वनुलिप्ताः सुवाससः।
प्रदक्षिणां च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान्॥२९॥
एतन्मम मतं तात क्रियतां यदि रोचते।
अयं गोब्राह्मणाद्रीणां मह्यं च दयितो मखः॥३०॥
- भागवत १०.२४.२७-३०

भावार्थः - (श्री कृष्ण ने कहा -) ‘वेदवादी ब्राह्मणों के द्वारा भली-भाँति हवन करवाया जाय तथा उन्हें अनेकों प्रकार के अन्न, गौएँ और दक्षिणाएँ दी जायँ। और भी, चाण्डाल, पतित तथा कुत्तों तक को यथायोग्य वस्तुएँ देकर गायों को चारा दिया जाय और फिर गिरिराज को भोग लगाया जाय। इसके बाद खूब प्रसाद खा-पीकर, सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनकर गहनों से सज-सजा लिया जाय और चन्दन लगाकर गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा गिरिराज गोवर्धन की प्रदक्षिणा की जाय। पिताजी! मेरी तो ऐसी ही सम्मति है। यदि आप-लोगों को रुचे तो ऐसा ही कीजिये। ऐसा यज्ञ गौ, ब्राह्मण और गिरिराज को तो प्रिय होगा ही, मुझे भी बहुत प्रिय है।’

श्रीशुक उवाच-
कालात्मना भगवता शक्रदर्पजिघांसया।
प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥३१॥
तथा च व्यदधुः सर्वं यथाह मधुसूदनः।
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजान्॥३२॥
उपहृत्य बलीन्सम्यगादृता यवसं गवाम्।
गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रुः प्रदक्षिणम्॥३३॥
अनांस्यनडुद्युक्तानि ते चारुह्य स्वलङ्कृताः।
गोप्यश्च कृष्णवीर्याणि गायन्त्यः सद्विजाशिषः॥३४॥
- भागवत १०.२४.३१-३४

भावार्थः - श्री शुकदेव जी कहते हैं - ‘परीक्षित! कालात्मा भगवान की इच्छा थी कि इन्द्र का घमण्ड चूर-चूर कर दें। नन्दबाबा आदि गोपों ने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर ली। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार का यज्ञ करने को कहा था, वैसा ही यज्ञ उन्होंने प्रारम्भ किया। पहले ब्राह्मणों से स्वस्ति वाचन कराकर उसी सामग्री से गिरिराज और ब्राह्मणों को सादर भेंट दीं तथा गौओं को हरी-हरी घास खिलायीं। इसके बाद नन्दबाबा आदि गोपों ने गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की। ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त करके वे और गोपियाँ भलीभाँति श्रृंगार करके और बैलों से जुती गाड़ियों पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करती हुई गिरिराज की परिक्रमा करने लगीं।’

गोवर्धन पूजा
कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः।
शैलोऽस्मीति ब्रुवन्भूरि बलिमादद्बृहद्वपुः॥३५॥
स्मै नमो व्रजजनैः सह चक्र आत्मनात्मने।
अहो पश्यत शैलोऽसौ रूपी नोऽनुग्रहं व्यधात्॥३६॥
एषोऽवजानतो मर्त्यान्कामरूपी वनौकसः।
हन्ति ह्यस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम्॥३७॥
इत्यद्रिगोद्विजमखं वासुदेवप्रचोदिताः।
यथा विधाय ते गोपा सहकृष्णा व्रजं ययुः॥३८॥
- भागवत १०.२४.३५-३८

भावार्थः - (श्री शुकदेव जी कहते हैं -) “भगवान श्रीकृष्ण गोपों को विश्वास दिलाने के लिये गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये, तथा ‘मैं गिरिराज हूँ।’ इस प्रकार कहते हुए सारी सामग्री आरोगने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उस स्वरूप को दूसरे व्रजवासियों के साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे - ‘देखो, कैसा आश्चर्य है! गिरिराज ने साक्षात प्रकट होकर हम पर कृपा की है। ये चाहे जैसा रूप धारण कर सकते हैं। जो वनवासी जीव इनका निरादर करते हैं, उन्हें ये नष्ट कर डालते हैं। आओ, अपना और गौओं का कल्याण करने के लिये इन गिरिराज को हम नमस्कार करें।’ इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से नन्दबाबा आदि बड़े-बड़े गोपों ने गिरिराज, गौ और ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन किया तथा फिर श्रीकृष्ण के साथ सब व्रज में लौट आये।”

अर्थात् श्रीकृष्ण दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये और उन्होंने कहा कि ‘मैं गिरिराज हूँ।’ इस प्रकार सभी ने एक तरह से भगवान श्रीकृष्ण की ही पूजा की। चुकी भगवान कर्म-फल दाता है इसलिए श्री कृष्ण रूप गोवर्धन या गिरिराज की पूजा करना चाहिए। देवताओं की नहीं। इस प्रकार गोवर्धन पूजा करने का कारण यह हुआ कि देवता की उपासना न कर के भगवान की उपासना करनी चाहिए। देवता कर्म-फल में परिवर्तन नहीं कर सकते परन्तु भगवान कर सकते है। अवश्य पढ़े - श्रीकृष्ण का गोवर्धन धारण करना। कृष्ण गोवर्धन लीला - भागवत पुराण

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