गोवर्धन पूजा क्यों की जाती है? - कृष्ण गोवर्धन लीला

गोवर्धन लीला

हिन्दुओं के प्रसिद्ध त्योहार दीपावली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोवर्धन पूजन, गौ-पूजन के साथ-साथ अन्नकूट पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन प्रात: ही नहा धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने इष्ट का ध्यान किया जाता है। इष्ट उसे कहा जाता है जिससे हमारी जीविका चलती है। वेदों शास्त्रों के अनुसार संसार और समस्त प्राणी का पालन करता केवल भगवान है जिनके कारण सबकी जीविका चलती है। इसके पश्चात् अपने घर या फिर देव स्थान के मुख्य द्वार के सामने गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाना शुरू किया जाता है। इसे छोटे पेड़, वृक्ष की शाखाओं एवं पुष्प से सजाया जाता है।

इस पर्व को मनाने का मुख्य कारण यह है कि देवताओं की उपासना या पूजा या भक्ति नहीं करे और केवल भगवान की (कृष्ण राम आदि) की ही भक्ति करे। इन्द्र यज्ञ नहीं करने का कारण - कृष्ण की गोवर्धन लीला - भागवत पुराण के लेख में हमने यह बताया है की कैसे भगवान श्री कृष्ण ने यह सिद्ध किया की देवताओं की उपासना नहीं करनी चाहिए। इस लेख का सर यही है कि देवता हमरे कर्म के फल में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते और वो हमें न तो सुख और न तो दुःख ही दे सकते है इसलिए उनकी पूजा या भक्ति करने का कोई लाभ नहीं है। कर्म का फल तो भगवान हमें देवताओं (शनि देव आदि) के माध्यम से हमें देते है। इसलिए अगर कर्म के फल को अगर आप बदलना चाहते भी है तो केवल भगवान की ही भक्ति करनी पड़ेगी।

संछेप में कृष्ण गोवर्धन लीला

संछेप में गोवर्धन लीला कुछ इस प्रकार है -
भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी के साथ वृन्दावन में रहकर अनेकों प्रकार की लीलाएँ कर रहे थे। उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँ के सब गोप इन्द्र-यज्ञ करने की तैयारी कर रहे हैं। इस बारे में उन्होंने नन्दबाबा आदि बड़े-बूढ़े गोपों से पूछा। तब उन लोगों ने बताया कि आज के दिन वृत्रासुर को मारने वाले तथा मेघों व देवों के स्वामी इन्द्र का पूजन होता है। इसे ‘इन्द्रोज यज्ञ’ कहते हैं। इससे प्रसन्न होकर इन्द्र ब्रज में वर्षा करते हैं और जिससे प्रचुर अन्न पैदा होता है।

श्रीकृष्ण ने कहा कि इन्द्र के प्रति किया यज्ञ व्यर्थ है। कर्म का फल भगवान देते है और देवता चाह कर भी कर्म-फल में परिवर्तन नहीं कर सकते है और न ही किसी को सुख-दुःख दे सकते है। वर्षा होना तो प्रकति का नियम है भले ही इन्द्र को इसका स्वामी कहा गया हो। इन्द्र ऐश्वर्य में लिप्त हो गया है और उसे अहंकार हो गया है इसलिए प्रकति के खिलाफ जाकर प्रसन्नता अनुसार वर्षा कर रहा है और अपने आपको अज्ञानता के कारण त्रिलोकी का स्वामी मान बैठा है।

फिर श्री कृष्ण ने गोवर्धन यज्ञ करने का कारण? कृष्ण गोवर्धन लीला - भागवत पुराण अनुसार कारण बताया। और यह सिद्ध किया की अगर पूजा करनी ही है तो इन्द्र की नहीं गोवर्धन की करनी चाहिए। फिर सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से पकवान लाकर गोवर्धन की तराई में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से पूजन करने लगे। फिर श्री कृष्ण ने अपने को दूसरे रूप में प्रकट किया और सभी की गोवर्धन पूजा को स्वीकार किया। इन्द्र पूजा बंद करके गोवर्धन की पूजा ब्रजवासी कर रहे हैं, यह बात इन्द्र तक जब पहुँच गई तो इन्द्र घनघोर वर्षा करवाने लगा।

ब्रजभूमि में मूसलाधार बरसात होने लगी। बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचते ही उन्होंने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा। वही सबकी रक्षा करेंगे। श्रीकृष्ण का गोवर्धन धारण करना - भागवत पुराण जब सब गोवर्धन पर्वत की तराई मे पहुँचे तो श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता-सा तान दिया और सभी को मूसलाधार हो रही वर्षा से बचाया। इन्द्र का क्षमा मांगना और श्री कृष्ण का अभिषेक - कृष्ण की गोवर्धन लीला - भागवत पुराण ७ दिन तक यह चमत्कार देखकर इन्द्रदेव को अपनी की हुई गलती पर पश्चाताप हुआ और वे श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित है।

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