महावाक्य क्या है? - वेदों के चार महावाक्य

चार महावाक्य

महावाक्य क्या है? इसे इतना महत्व क्यों दिया जाता है? वेदों के चार महावाक्य कौन से हैं? उन्हें महावाक्य का दर्जा क्यों दिया जाता है? इत्यादि, कई प्रश्न है महावाक्य पर। अतएव इन सभी प्रश्नों पर विस्तार से इस लेख में जानेंगे।

महावाक्य क्या है?

वेदों के वाक्य जिनमें बहुत गहन विचार समाये हुए हैं उन्हें महावाक्य कहा जाता है। ये वेदों के सार, उपनिषदों से लिए गए हैं। इन्हें महावाक्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि कृष्ण यजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् २२ में चार महावाक्य का उल्लेख मिलता है।

अथ महावाक्यानि चत्वारि। यथा।
ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म॥१॥
ॐ अहं ब्रह्मास्मि॥२॥
ॐ तत्त्वमसि॥३॥
ॐ अयमात्मा ब्रह्म॥४॥
तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति
ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति॥
- शुकरहस्योपनिषद् २२

अर्थात् :- अब चार महावाक्य दिये जाते हैं। १. ॐ प्रज्ञानम् ब्रह्म। २. ॐ अहं ब्रह्मास्मि। ३. ॐ तत्त्वमसि। ४. ॐ अयमात्मा ब्रह्म। इनमें से यह ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य ब्रह्म से अभेद का प्रतिपादन करता है। जो साधक इसका जप (चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान् शिव से सायुज्य मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं।

ध्यान दे, ज्ञानमार्ग के पालन करने वालों को ‘ज्ञानी’ कहा जाता है। जो साधक सायुज्य मुक्ति चाहते है उन्हें ज्ञानमार्ग का पालन करना पड़ता है। वास्तव में, सायुज्य मुक्ति में आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाती है। यानी यहाँ दो सत्ता का मिलान (एकत्व) हो जाता है। अतः, जो साधक ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता है वो इस ज्ञानमार्ग को अपनाते है और महावाक्य का चिन्तन-मनन करते है।

वेदों के चार महावाक्य

उपर्युक्त शुकरहस्योपनिषद् में चार महावाक्य बताये गए है। किन्तु, इसके आलावा भी वेदों के अन्य उपनिषदों में यह चार महावाक्य प्राप्त होते है। वेदों में वर्णित चार वाक्य -

१. प्रज्ञानं ब्रह्म - “यह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है” (ऐतरेय उपनिषद् १.३.३ - ऋग्वेद)
२. अहं ब्रह्मास्मीति - “मैं ब्रह्म हुँ” ( बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१० - यजुर्वेद)
३. तत्त्वमसि - “वह ब्रह्म तु है” (छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७- सामवेद )
४. अयम् आत्मा ब्रह्म - “यह आत्मा ब्रह्म है” (माण्डूक्य उपनिषद् १/२ - अथर्ववेद)

इन्हें ही मुख्य रूप से महावाक्य कहा जाता है। ‘ज्ञानियों’ ने ‘ज्ञानमार्ग’ का समर्थन करने वाले चार वेदों से चार वाक्य लिए। ‘ज्ञानियों’ ने इन महावाक्यों का बहुत प्रचार किया क्योंकि उन्हें वेदों के प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध करना था कि सारा संसार ब्रह्म है और आत्मा भी ब्रह्म है।

कुछ लोग महावाक्यों को वेदों का सार कहते है, लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं है। क्योंकि वेद ज्ञान का महासागर है, पूर्ण महासागर का ज्ञान एक बूंद से नहीं हो सकता, हाँ! उसके एक बूंद से अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त भी वेद में ऐसी बहुत सी ऋचाएं है जो ज्ञानमार्ग के विपरीत है। इसका तातपर्य यह नहीं है कि वे वेद विरुद्ध है। तातपर्य यह है कि केवल ज्ञानमार्ग ही नहीं है जो ब्रह्म की प्राप्ति करा सकता है, इसके अतिरिक्त अन्य मार्ग भी है।

अतएव, ज्ञानमार्ग के साधक, जो जीवन भर इन्ही वाक्यों का अनुसरण करते हुए परम स्थिति को प्राप्त करते है, उनके लिए यह वाक्य महान है। इसलिए, इन वाक्यों को महावाक्य कहा जाता है। महावाक्य ज्ञानमार्ग के साधकों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वो ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं। यह एक अलग ही दर्शन है जो एक ही तत्व को स्वीकार करता है।

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