हरि नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिये? मन या इन्द्रियों से - पुराण और रामायण के अनुसार।

नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिये? राम नाम संकीर्तन कैसे हो? कृष्ण नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिये?

जैसा की हमने अपने भगवान के नाम की महिमा - वेद, पुराण और रामायण के अनुसार। लेख में बताया कि भगवान् ने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, नाम संकीर्तन भजन तीर्थों से भी अधिक पावन तीर्थ कहा गया है एवं जिससे जीवों का उद्धार बड़ा सहज में हो जाता है। तो अब यह प्रश्न शेष रह जाता है कि नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिए? क्योंकि अगर सही ढंग से कोई कार्य नहीं किया तो उसका फल सही नहीं मिलता। अतएव केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो? मन से नाम संकीर्तन हो? या मन और इन्द्रियों के साथ नाम संकीर्तन हो?

केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो?

बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि किसी भी प्रकार से भगवान का नाम लिया जायेगा तो उसका फल भगवान की कृपा है और ऐसा तुलसीदास जी ने कहा है -

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
- श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड

भावार्थ:- अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।

परन्तु, इस चौपाई को पूरा पढ़ें तो सत्य का बोध हो जायेगा।

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
- श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड

भावार्थ:- अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी राम नाम का स्मरण करके और रघुनाथ को मस्तक नवाकर मैं राम के गुणों का वर्णन करता हूँ।

इस चौपाई में तुलसीदास जी राम नाम जपने में राम नाम के स्मरण को महत्व दिया है। और स्मरण तो मन ही करता है। तुलसीदास कृत श्रीराम की आरती लोग गाते है "श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन" जिसका अर्थ ही होता है कि हे मन! तू कृपालु श्री रामचंद्रजी का भजन कर। और तो और तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका में राम आरती करने के बाद मन द्वारा क्या क्या करना है वो तक कहा है। अगर अभी भी आपके मन में शंका है कि बिना मन के किसी भी तरह राम नाम का जप करने से फल मिलता है ऐसा तुलसीदासजी कहते है। तो आप अवश्य पढ़े भगवान का नाम लेने की विधि? नाम का जप मन या जीभा से? - रामायण, दोहावली के अनुसार।

तो केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो ऐसा कहना भोलापन है। क्योंकि इन्द्रियों के कार्य को संसारी सरकार भी नहीं मानती। अगर किसी ने खून किया है लेकिन खून करने की मंशा नहीं थी, तो उस व्यक्ति को सजा नहीं होती। अतएव केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो? यह सिद्धांत सही नहीं है।

मन से नाम संकीर्तन हो?

मन से नाम संकीर्तन हो! यह बात सही है। क्योंकि निम्नलिखित प्रमाणों में बार-बार यही बात कही जारी है कि नामों का स्मरण करने -

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥
- श्रीरामरक्षास्त्रोत्रम् १२

भावार्थ:- राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता, इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है।

बुधकौशिक नामक ऋषि ने श्रीरामरक्षास्तोत्रम् को रचा है। उपर्युक्त श्रीरामरक्षास्तोत्रम् में कहते है कि श्रीराम के नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता और मोक्ष तक प्राप्त कर लेता है।

ते मूर्खा ह्यकृतात्मानः पुत्रशोकादि विह्वलाः॥३२॥
रुदंति बहुलालापैर्न कृष्णाक्षरकीर्तने।
- पद्म पुराण खण्ड ३ (स्वर्गखण्ड) अध्याय ५०

भावार्थ:- (सूतजी कहते है) जो अजितेन्द्रिय पुरष पुत्रशोकादि से व्याकुल होकर अत्यन्त विलाप करते हुए रोते हैं, किन्तु श्री कृष्ण नाम के अक्षरों का कीर्तन करते हुए नहीं रोते, वे मुर्ख हैं।

हरि नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिये? उत्तर - श्री कृष्ण नाम के अक्षरों का कीर्तन करते हुए व्याकुल होकर रोना चाहिए। कब आपके दर्शन होंगे, सेवा मिलेगी इत्यादि मन में भावना बनाकर। अगर कोई ऐसा नहीं कर रहा है? तो पद्म पुराण में सूतजी के वाक्य अनुसार वो मुर्ख है।

एक बार नारदजी ने ब्रह्मा जी से प्रश्न किया कि विश्वेश्वर! जो सम्पूर्ण विश्व के स्वामी साक्षात श्रीनारायण हरि है, इन अविनाशी परमात्मा के नाम की कैसी महिमा है? जिसका उत्तर ब्रह्माजी ने दिया -

ये वदंति नरा नित्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्।
तस्योच्चारणमात्रेण विमुक्तास्ते न संशयः॥१२॥
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि तपः कर्मात्मकनि वै।
यानि तेषामशेषाणा कृष्णानुस्मरणं परम्॥१३॥
प्रातर्निशि तथा सायं मध्याह्नादिषु संस्मरन्।
नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयं नरः॥१४॥
- पद्म पुराण खण्ड ६ उत्तरखण्ड अध्यायः ७२

भावार्थ:- ब्रह्माजी बोले - (नारद!) जो मनुष्य 'हरि' इस दो अक्षरों वाले नाम का सदा उच्चारण करते है, वे उसके उच्चारण मात्र से मुक्त हो जाते है - इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तपस्या के रूप में किया जाने वाला जो सम्पूर्ण प्रायश्चित है, उन सबकी अपेक्षा श्रीकृष्ण का निरंतर स्मरण श्रेष्ठ है। जो मनुष्य प्रातः, सायं, रात्रि तथा मध्याह्न आदि के समय 'नारायण' नाम का स्मरण करता है, उसके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते है।

उपर्युक्त श्लोक में ब्रह्मा जी जहा हरि नाम का उच्चारण करने को कह रहे है। वही पर हरि (कृष्ण) नाम का स्मरण करने को भी बोल रहे है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्मरण महवपूण है उच्चारण के साथ। अब प्रश्न मन में बार बार उठा है कि आखिर क्यों मन को इतना महत्व दिया जा रहा है? तो इसका उत्तर बड़ा स्पष्ट है। मन ही सब कुछ का करता धर्ता है। अर्थात् प्रेम, दुश्मनी, कर्म, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य इत्यादि जो कुछ हो सब मन को करना है। इस पर अनादि वेद ने कहा -

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
- ब्रह्मबिन्दूपनिषद् २, शाट्यायनीयोपनिषद् १

भावार्थ:- मन ही मानव के बंध और मोक्ष का कारण है, जो वह विषयासक्त हो तो बंधन कराता है और निर्विषय हो तो मुक्ति दिलाता है।

अर्थात् मन माया के आधीन है। जब मन माया के बंधन से छूटेगा तब मुक्ति होगी। जैसा की कहा जाता है कि हरि नाम संकीर्तन से मुक्ति होगी। तो वो मुक्ति इसीलिए होती है क्योंकि मन सदा भगवान में लगा रहता है और जहाँ भगवान होंगे वह माया नहीं होगी। इसलिए सहज में मुक्ति मिल जाती है।

मन और इन्द्रियों के साथ नाम संकीर्तन हो?

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥
- श्रीरामरक्षास्तोत्रम् २९

भावार्थ:- मैं (बुधकौशिक ऋषि) एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ।

उपर्युक्त श्रीरामरक्षास्तोत्रम् में बुधकौशिक ऋषि कहते है कि मैं (बुधकौशिक ऋषि) एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण (मन द्वारा) और वाणी से (इन्द्रिय द्वारा) गुणगान करता हूँ। फिर वाणी द्धारा (इन्द्रिय द्वारा) और पूरी श्रद्धा के साथ (श्रद्धा मन से होती है) भगवान रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ।

सारांश यह है कि मन से स्मरण करना महत्वपूर्ण है। मन और इन्द्रियाँ भी लगकर कीर्तन करना चाहिए। लेकिन केवल इन्द्रियों से कीर्तन? कीर्तन नहीं है। अतएव मन द्वारा भगवान का स्मरण कर, उनके नाम का उच्चारण प्रेम तथा अन्य भावों से उक्त होकर, आँसू बहाते हुए हरि नाम संकीर्तन करना चाहिए। साथ में वाद्ययंत्र भी हो तो अच्छा है। अगर ऐसा कोई नहीं कर रहा है? तो पद्म पुराण ३ (स्वर्गखण्ड) अध्याय ५०. ३२-३३ सूतजी के वाक्य अनुसार वो मुर्ख है।

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