श्री कृष्ण का शरीर दिव्य था या माया के आधीन था? - भागवत अनुसार

श्री कृष्ण का शरीर दिव्य था - भागवत अनुसार

भगवान श्री कृष्ण के अवतार के बारे में कुछ लोगों की यह मान्यता है कि श्री कृष्ण का शरीर आम मायाधीन मनुष्यों की तरह है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। भगवान श्री कृष्ण का शरीर दिव्य है जिसे दिव्य चिन्मय शरीर कहा जाता है। ऐसे ही दिव्य चिन्मय शरीर बलराम तथा राधा जी का भी है। भागवत पुराण श्री कृष्ण के शरीर के बारे में कहती है -

भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः।
आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥१६॥
स बिभ्रत्पौरुषं धाम भ्राजमानो यथा रविः।
दुरासदोऽतिदुर्धर्षो भूतानां सम्बभूव ह॥१७॥
ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं समाहितं शूरसुतेन देवी।
दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥१८॥
- भागवत पुराण १०.२.१६-१८

भावार्थ:- भगवान भक्तों को अभय करने वाले हैं। वे सर्वत्र सब रूप में हैं, उन्हें कहीं आना-जाना नहीं है। इसलिए वे वसुदेव जी के मन में अपनी समस्त कलाओं के साथ प्रकट हो गये। उसमें विद्यमान रहने पर भी अपने को अव्यक्त से व्यक्त कर दिया। भगवान की ज्योति को धारण करने के कारण वसुदेव सूर्य के सामान तेजस्वी हो गये, उन्हें देखकर लोगों की आँखें चौंधियां जातीं। कोई भी अपने बल, वाणी प्रभाव से उन्हें दबा नहीं सकता था। भगवान के उस ज्योतिर्मय अंश को, जो जगत का परम मंगल करने वाला है, वसुदेव जी के द्वारा आधान किये जाने पर देवी देवकी ने ग्रहण किया। जैसे पूर्व दिशा चन्द्रदेव को धारण करती है, वैसे ही शुद्ध सत्त्व से संपन्न देवी देवकी ने विशुद्ध मन से सर्वात्मा एवं आत्मस्वरूप भगवान को धारण किया।

जब भगवान वासुदेव जी के मन में गए उसके बाद देवकी के मन में गए। फिर वहा से भगवान ने वही अनुभव माँ देवकी को होने लगी जैसे किसी गर्भ धारण स्त्री को होने लगी। अतएव भगवान श्री कृष्ण का शरीर माँ के पेट में नहीं बना। आगे और भी प्रणाम है जिससे यह बात और स्पस्ट हो जाएगी।

सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान्स्थितौ शरीरिणां श्रेयौपायनं वपुः
वेदक्रियायोगतपःसमाधिभिस् तवार्हणं येन जनः समीहते॥३४॥
सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम्
गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः॥३५॥
न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिर्निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः।
मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो देव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि॥३६॥
- भागवत १०.२.३४-३६

भावार्थ:- (गर्भस्तुति करते हुए देवताओं ने कहा -) आप संसार की स्थिति के लिये समस्त देहधारियों को परम कल्याण प्रदान करने वाला विशुद्ध सत्त्वमय, सच्चिदानन्दमय, परम दिव्य मंगल-विग्रह प्रकट करते हैं। उस रूप के प्रकट होने से ही आपके भक्त वेद, कर्मकाण्ड, अष्टांगयोग, तपस्या और समाधि के द्वारा आपकी आराधना करेंगे? प्रभो! आप सबके विधाता हैं। यदि आपका यह विशुद्ध सत्त्वमय निज स्वरूप न हो, तो अज्ञान और उसके द्वारा होने वाले भेदभाव को नष्ट करने वाला अपरोक्ष ज्ञान ही किसी को न हो। जगत में दिखने वाले तीनों गुण आपके हैं और आपके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं, यह सत्य है। परन्तु इन गुणों की प्रकाशक वृत्तियों से आपके स्वरूप का केवल अनुमान ही होता है, वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता। भगवन! मन और वेद-वाणी के द्वारा केवल आपके स्वरूप का अनुमान मात्र होता है। क्योंकि आप उनके द्वारा दृश्य नहीं; उनके साक्षी हैं। इसलिए आपके गुण, जन्म और कर्म आदि के द्वारा आपके नाम और रूप का निरूपण नहीं किया जा सकता। फिर भी प्रभो! आपके भक्तजन उपासना आदि क्रियायोगों के द्वारा आपका साक्षात्कार तो करते ही हैं।

अर्थात् भगवान देहधारिओं (माया के आधीन जीव) को परम कल्याण प्रदान करने के लिए अवतार लेते है और उनका शरीर विशुद्ध सत्त्वमय, सच्चिदानन्दमय, परम दिव्य है। माया के तीन गुण (सत्व, रज और तम) भगवान के द्वारा प्रकाशित है। परन्तु इन गुणों की प्रकाशक वृत्तियों से भगवान के स्वरूप का केवल अनुमान ही होता है। हम लोग माया के आधीन है इसलिए अगर भगवान अभी प्रकट हो जाये तो उनका वास्तविक शरीर (दिव्य शरीर) देखने के बजाए उनको एक माया के आधीन कोई साधारण व्यक्ति ही देखेंगे क्योंकि अभी हम लोग माया के आधीन है। तुलसीदास जी के शब्दों में 'जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।' भगवान के वास्तविक दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार तो भगवान के कृपा से ही होगा। श्री कृष्ण का दिव्य शरीर देखने के लिए अर्जुन को भी भगवान की दिव्य दृष्टि मिली। तब उस दिव्य दृष्टि से अर्जुन ने भगवान का वास्तविक स्वरूप देखा।

तमद्‍भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शंखगदार्युदायुधम्।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभि कौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्॥९॥
महार्हवैदूर्यकिरीटकुण्डल त्विषा परिष्वक्त सहस्रकुन्तलम्।
उद्दाम काञ्च्यङ्‍गद कङ्कणादिभिः विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत॥१०॥
स विस्मयोत्फुल्ल विलोचनो हरिं सुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा।
कृष्णावतारोत्सव संभ्रमोऽस्पृशन् मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम्॥११॥
अथैनमस्तौदवधार्य पूरुषं परं नताङ्‌गः कृतधीः कृताञ्जलिः।
स्वरोचिषा भारत सूतिकागृहं विरोचयन्तं गतभीः प्रभाववित्॥१२॥
- भागवत पुराण १०.३.९-१२
श्री कृष्ण का जन्म

भावार्थ:- वसुदेव जी ने देखा, उनके सामने एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं। चार सुन्दर हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल लिये हुए है। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न - अत्यन्त सुन्दर सुवर्णमयी रेखा है। गले में कौस्तुभमणि झिलमिला रही है। वर्षाकालीन मेघ के समान परम सुन्दर श्यामल शरीर पर मनोहर पीताम्बर फहरा रहा है। बहुमूल्य वैदूर्यमणि के किरीट और कुण्डल की कान्ति से सुन्दर-सुन्दर घुँघराले बाल सूर्य की किरणों के सामान चमक रहे हैं। कमर में चमचमाती करधनी की लड़ियाँ लटक रहीं हैं। बाँहों में बाजूबंद और कलाईयों में कंकण शोभायमान हो रहे हैं। इन सब आभूषणों से सुशोभित बालक के अंग-अंग से अनोखी छटा छिटक रही है। जब वसुदेव जी ने देखा कि मेरे पुत्र के रूप में स्वयं भगवान ही आये हैं, तब पहले तो उन्हें असीम आश्चर्य हुआ; फिर आनन्द से उनकी आँखें खिल उठी। उनका रोम-रोम परमानन्द में मग्न हो गया। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाने की उतावली में उन्होंने उसी समय ब्राह्मणों के लिए दस हज़ार गायों का संकल्प कर दिया। परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण अपनी अंगकांति से सूतिका गृह को जगमग कर रहे थे। जब वसुदेव जी को यह निश्चय हो गया कि ये तो परम पुरुष परमात्मा ही हैं, तब भगवान का प्रभाव जान लेने से उनका सारा भय जाता रहा। अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने भगवान के चरणों में अपना सर झुका दिया और फिर हाथ जोड़कर वे उनकी स्तुति करने लगे।

भागवत पुराण १०.३.९-१२ से सिद्ध होता है कि भगवान विष्णु शरीर में प्रकट हुए क्योंकि उसवक्त भगवान के चार हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल था तथा वो पीताम्बर पहने हुए थे। गर्भ से कोई भी बच्चा ऐसे तो पैदा नहीं होता। चलो अब तक के सभी तर्क तथा प्रमाण को नहीं मानते है। तो फिर वसुदेव जी ने उस अद्भुत बालक (भगवान विष्णु सदा १६ वर्ष की अवस्था में रहते है) की स्तुति की। तो अगर उस बालक को साधारण बालक मान भी ले तो कोई भी पिता अपने नवजात बच्चे की स्तुति तो नहीं करता। यहाँ तक की माता देवकी ने भी स्तुति की। अतएव यह सिध्य होता है कि भगवान माता देवकी के गर्भ से पैदा ही नहीं हुए थे।

रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम्।
सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षात् विष्णुरध्यात्मदीपः॥२४॥
- भागवत पुराण १०.३.२४

भावार्थ:- (माता देवकी ने वासुदेव जी के स्तुति के उपरांत कहा) प्रभो! वेदों ने आपके जिस रूप को अव्यक्त और सबका कारण बतलाया है, जो ब्रह्म, ज्योतिस्वरूप, समस्त गुणों से रहित और विकारहीन हैं, जिसे विशेषणरहित - अनिर्वचनीय, निष्क्रिय एवं केवल विशुद्ध सत्ता के रूप में कहा गया है - वही बुद्धि आदि के प्रकाशक विष्णु आप स्वयं हैं।

अर्थात् जो श्री कृष्ण की माता कही जाती है वो स्वयं जन्म के वक्त विष्णु स्वरूप को देखा।

उपसंहर विश्वात्मन् अदो रूपं अलौकिकम्।
शंखचक्रगदापद्म श्रिया जुष्टं चतुर्भुजम्॥३०॥
विश्वं यदेतत् स्वतनौ निशान्ते यथावकाशं पुरुषः परो भवान्।
बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगो अभूद् अहो नृलोकस्य विडंबनं हि तत्॥३१॥
- भागवत पुराण १०.३.३०-३१

भावार्थ:- (माता देवकी ने वासुदेव जी के स्तुति के उपरांत कहा -) विश्वात्मन! आपका यह रूप अलौकिक है। आप शंख, चक्र, गदा और कमल की शोभा से युक्त अपना यह चतुर्भुज रूप छिपा लीजिये। प्रलय के समय आप इस सम्पूर्ण विश्व को अपने शरीर में वैसे ही स्वाभाविक रूप से धारण करते हैं, जैसे कोई मनुष्य अपने शरीर में रहने वाले छिद्ररूप आकाश को। वही परम पुरुष परमात्मा आप मेरे गर्भवासी हुए, यह आपकी अद्भुत मनुष्य-लीला नहीं तो और क्या?

भागवत पुराण १०.३.३०-३१ से यह प्रमाणित होता है जहा माता देवकी ने स्वयं भगवान से कहा कि आपका यह चतुर्भुज रूप छिपा लीजिये। (अर्थात् अब नवजात बालक के रूप में धारण कीजिये) माता देवकी ने स्वयं स्वीकार किया कि यह भगवान की अद्भुत मनुष्य-लीला वो मेरे गर्भ में नहीं थे।

एतद्वां दर्शितं रूपं प्राग्जन्मस्मरणाय मे।
नान्यथा मद्भवं ज्ञानं मर्त्यलिङ्गेन जायते॥४४॥
युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत्।
चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम्॥४५॥
- भागवत पुराण १०.३.४४-४५

भावार्थ:- (श्री भगवान ने कहा माता देवि से कहा) मैंने तुम्हें अपना यह रूप इसलिये दिखला दिया है कि तुम्हें मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाय। यदि मैं ऐसा नहीं करता, तो केवल मनुष्य-शरीर से मेरे अवतार की पहचान नहीं हो पाती। तुम दोनों मेरे प्रति पुत्रभाव तथा निरन्तर ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य-स्नेह और चिन्तन के द्वारा तुम्हें मेरे परम पद की प्राप्ति होगी।'

श्रीशुक उवाच
इत्युक्त्वासीत् हरिः तूष्णीं भगवान आत्ममायया।
पित्रोः संपश्यतोः सद्यो बभूव प्राकृतः शिशुः॥४६॥
ततश्च शौरिः भगवत्प्रचोदितः सुतं समादाय स सूतिकागृहात्
यदा बहिर्गन्तुमियेष तर्ह्यजा या योगमायाजनि नन्दजायया॥४७॥
- भागवत पुराण १०.३.४६-४७

भावार्थ:- श्री शुकदेव जी कहते हैं - भगवान इतना कहकर चुप हो गये। अब उन्होंने अपनी योगमाया से पिता-माता के देखते-देखते तुरंत एक साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया। तब वसुदेव जी ने भगवान की प्रेरणा से अपने पुत्र को लेकर सूतिका गृह से बाहर निकलने की इच्छा की। उसी समय नन्दपत्नी यशोदा के गर्भ से उस योगमाया का जन्म हुआ, जो भगवान की शक्ति होने के कारण उनके समान ही जन्म-रहित है।

अतएव उपर्युक्त सभी प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि भगवान ने सर्वप्रथम अपने चतुर्भुज विष्णु स्वरूप को प्रकट किया फिर माता देवकी तथा पिता वासुदेव ने यह स्वीकार किया की भगवान प्रकट हुए है और वे मेरे गर्भ में नहीं थे, वे मनुष्य-लीला कर रहे थे। फिर माता देवकी ने उन्हें बालक स्वरूप में प्रकट होने हो कहा। तब भगवान ने साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया।

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