भक्ति केवल भगवान की करनी चाहियें, देवताओं की नहीं। - वेद, पुराण अनुसार

भक्ति की भगवान

आज कल कुछ लोग भगवान की भी भक्ति करते है और साथ ही साथ देवताओं की भी करते है। जो भक्त भगवान सम्बन्धी फल चाहते है उन्हें तो ऐसा बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। भक्ति केवल भगवान की ही करनी चाहिए, देवताओं की नहीं ऐसा क्यों? इस सिद्धांत को हम आप को वेद पुराणों गीता आदि के प्रमाणों से सिद्ध करेंगे।

सर्वप्रथम यह समझ लीजिये कि स्वर्ग के देवी-देवता है कौन? ८४ लाख माया के शरीरो में से केवल मनुष्य शरीर में ही कर्म करने का अधिकार है। गरुडपुराण कहता है -

चतुरशीतिलक्षेषु शरीरेषु शरीरिणाम्।
न मानुषं विनान्यत्र तत्त्वज्ञानन्तु लभ्यते॥२.४९.१३॥
- गरुडपुराण धर्मकाण्ड - प्रेतकल्प अध्यायः ४९

संछिप्त भावार्थः - चौरासी लाख योनियों (शरीरों) में स्थित जीवात्माओं को बिना मानव योनि (शरीर) मिले तत्वज्ञान का लाभ नहीं मिल सकता।

यानि भगवान, जीव और माया तत्व क्या है? इस तत्वज्ञान का लाभ केवल मानव शरीर में हो सकता है और फिर भगवत प्राप्ति हो सकती है। इसीलिए वेद कहता है -

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥५॥
- केनोपनिषद् २.५

भावार्थः - यदि इस मनुष्य-शरीर में (परब्रह्म को) जान लिया तब तो बहुत कुशल है, यदि इस शरीर के रहते-रहते (उसे) नहीं जान पाया (तो) महान विनाश है। (यही सोचकर) बुद्धिमान पुरुष प्राणि-प्राणिमें (प्राणिमात्रमें) (परब्रह्म पुरुषोत्त्म को) समझकर इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।

अतएव केवल मनुष्य शरीर से ही कल्याण हो सकता है नहीं तो महान विनाश है। मनुष्य शरीर के अतिरिक्त जितने भी शरीर है वो भोग शरीर है। वहाँ फल भोगा जाता है। उन्हीं ८४ लाख शरीरों में से एक स्वर्ग के देवी-देवताओं का शरीर है। दरअसल, मनुष्य जब अधिक पुण्य कर लेता है तो पुण्य अनुसार उसे स्वर्ग लोक में देवी या देव का शरीर मिलता है वो भी कुछ समय तक। चुकी मुक्ति नहीं हुई है और अभी स्वर्ग में देवी-देवता शरीर में जीव है इसलिए इनमें काम, क्रोध, लोभ, इर्षा आदि माया के विकार रहते है। जब पुण्य समाप्त होता है तो इन्हें नर्क (क्योंकि पाप भी अपने पूर्व जन्मों में किये है तो उसका फल भोगने के लिए जाना पड़ता है) या कुते, बिल्ली, आदि के शरीर में जाना पड़ता है पूर्व जन्म के कर्म-फल अनुसार। प्रमाणों द्वारा जानने के लिए पढ़े - देवी-देवता और भगवान में क्या अंतर है?

तो चुकी देवताओं का शरीर भोग शरीर है इसलिए उन्हें कर्म करने का अधिकार नहीं है। वे केवल अपने पुण्य कर्म अनुसार फल भोग सकते है। इसलिए वो किसी भी मनुष्य के कर्म-फल को न तो बदल सकते है। और जब वे बदल नहीं सकते तो किसी को सुख-दुःख भी नहीं दे सकते। अगर किसी मनुष्य को देवता द्वारा सुख-दुःख मिला हो तो वो उसके कर्म का फल ही है इसमें देवताओं का कोई कमाल नहीं है। क्योंकि वेद कहता है -

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥७॥
- कठोपनिषद २.२.७

भावार्थः - जिसका जैसा कर्म होता है और शस्त्रादि के श्रवण द्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त होता है (उन्हीं के अनुसार) शरीर धारण करने के लिए कितने ही जीवत्मा तो (नाना प्रकार की जङ्गम) योनियों को प्राप्त हो जाते है (और) दूसरे (कितने ही) स्थाणु (स्थावर) भाव का अनुसरण करते है।

अर्थात् अपने-अपने शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार और शास्त्र, शिक्षा आदि के द्वारा देखे-सुने हुए भावों से निर्मित अन्तकालीन वासना के अनुसार मरने के पश्चात् कितने ही जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करते है। जिनके पाप पुण्य समान उसे मनुष्य का, जिनके पुण्य कम और पाप अधिक उसे पशु-पक्षी का और जिनके पाप अधिक होते है वो स्थावर (जड शरीर जैसे वृक्ष आदि) का शरीर प्राप्त होता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.१३ और कठोपनिषद् २.२.१३ में भी यह मंत्र आया है ‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।’ अर्थात् जो एक नित्य चेतन (परमात्मा) बहुत से नित्य चेतन आत्माओं के कर्मफल भोगों का विधान करता है। अतएव कर्म का फल देना केवल भगवान के हाथ में है, देवताओं का कोई कमाल नहीं है। इस बात को श्री कृष्ण ने अपने गोवर्धन लीला में विस्तार से बताया है।

किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम्।
अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम्॥ १५॥
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते।
स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥ १६ ॥
देहानुच्चावचाञ्जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा।
शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः॥ १७ ॥
- भागवत १०.२४.१५-१७

भावार्थः - (श्री कृष्ण ने कहा -) ‘जब सब प्राणी अपने-अपने कर्मों का ही फल भोग रहे हैं, तब हमें इन्द्र की क्या आवश्यकता है? पिताजी! जब वे पूर्वसंस्कार के अनुसार प्राप्त होने वाले मनुष्यों के कर्म-फल को बदल ही नहीं सकते - तब उनसे प्रयोजन? मनुष्य अपने स्वभाव (पूर्व-संस्कारो) के अधीन है। वह उसी का अनुसरण करता है। यहाँ तक कि देवता, असुर, मनुष्य आदि को लिये हुए यह सारा जगत स्वभाव में ही स्थित है। जीव अपने कर्मों के अनुसार उत्तम और अधम शरीरों को ग्रहण करता और छोड़ता रहता है। अपने कर्मों के अनुसार ही ‘यह शत्रु है, यह मित्र है, यह उदासीन है’ - ऐसा व्यवहार करता है।’

अर्थात् सब प्राणी अपने-अपने कर्मों का ही फल भोग रहे हैं। अपने कर्मों के अनुसार उत्तम और अधम शरीरों (८४ लाख शरीर) को ग्रहण करता और छोड़ता है। अपने कर्मों के कारण उसका स्वभाव बनता है और स्वभाव के अनुसार ही वो व्यवहार करता है। इन्द्र पूर्वसंस्कार (पूर्व कर्म) के अनुसार प्राप्त होने वाले मनुष्यों के कर्म-फल को बदल ही नहीं सकते, इसलिए इन्द्र किसी का बुरा भला नहीं कर सकते। तो जब इन्द्र हमारा बुरा भला नहीं कर सकते, तो यह यज्ञ करने से वो हमारा भला करेगें यह सिधांत गलत है। अतएव यह यज्ञ करना व्यर्थ है। अवस्य पढ़े - इन्द्र यज्ञ नहीं करने का कारण - कृष्ण की गोवर्धन लीला - भागवत पुराण

अतएव तो भक्त को देवताओं की भक्ति या पूजा नहीं करनी चाहियें।

भक्ति केवल भगवान की करनी चाहिए

इस सम्बन्ध में भागवत ने बड़ा सुंदर विवरण मिलता है। परीक्षित ने शुकदेव परमहंस से प्रश्न किया -

यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो।
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्॥
- भागवत १.१९.३८

भावार्थः - (परीक्षित ने कहा -) ‘भगवन! यह बतलाइये कि मनुष्य मात्र को क्या करना चाहिये। वो किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करे?’

तो शुकदेव परमहंस ने उत्तर दिया -

तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम्॥
- भागवत २.१.५

भावार्थः - (शुकदेव जी ने कहा-) ‘परीक्षित! जो अभय पद को प्राप्त करना चाहते है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान, भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये।’ विस्तार से पढ़े - मनुष्य का क्या कर्तव्य है, क्या करें और क्या नहीं करें है?

अन्याश्रयाणां त्यागोनन्यता।
- नारद भक्ति सूत्र १०

भावार्थः - अन्य (भगवान को छोड़कर) दूसरे का आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।

अर्थात् नारद जी कहते है कि भक्ति में भक्त भगवान को छोड़कर दूसरे का आश्रय नहीं लेना चाहियें। अब वो चाहे देवता हो, मनुष्य हो या राक्षस ही क्यों न हो। इनका आश्रयों नहीं लेना चाहियें।

नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।
- नारद भक्ति सूत्र १९

भावार्थः - देवर्षि नारद के मत में अपने सब कर्मों को भगवान को अर्पण करना और भगवान का थोड़ा भी विस्मरण होनें में परम व्याकुल होना ही भक्ति है।

अर्थात् नारद जी कहते है भक्त को दो काम करना चाहिए "भगवान का सदा स्मरण और भगवान का विस्मरण होने पर वकुल हो कर उसका स्मरण करें" गीता १८.६२ में भी 'परमेश्वर की ही शरण' में जाने को कहा है।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
- गीता १८.६२

भावार्थः - (श्री कृष्ण ने कहा -) हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण* में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।

* (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है)

अस्तु, तो श्री कृष्ण की गोवर्धन लीला और वेद पुराणों अनुसार भक्ति सूत्र और गीता से यह सिद्ध होता है कि भक्ति केवल भगवान की करनी चाहिए, देवताओं की नहीं।

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