क्या हम दीपावली मना रहे है?

दीपावली

दीपावली अर्थात दीप मतलब दिया और वली मतलब पंक्तियां। दीपावली का अर्थ है - दीपों की पंक्तियां

क्या हम दीपावली मना रहे है? आज यह प्रश्न करना जरुरी है। हम लोग दीपावली से पहले रूम को साफ करते है। दीपावली के दिन हम लोग लक्ष्मी गणेश की पूजा करते हैं। उसके बाद कुछ लोग अपने रिस्तेदारो के घर मिठाई लेके जाते हैं, बड़ो से आशीर्वाद लेते हैं। कुछ लोग दोस्तों को व्हाट्सएप्प से हैप्पी दीपावली विष करते हैं, तो कुछ लोग कॉल कर के विष करते हैं। तो कुछ लोग पटाखे जलाते हैं। कुछ लोग अपने रूम को बहुत सुन्दर सजाते हैं। कुछ लोग मोमबती जलाते हैं और वो भी अलग अलग डिजाइन की। अस्तु, तो लोग बहुत कुछ करते हैं, आप लोग तो जानते ही हैं, इस सम्बन्ध में मुझे और कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं हैं।

उपर्युक्त कार्य जो लोग करते है उसका दीपावली से कुछ भी लेना देना नहीं है। वो सब कार्य लोग सभ्यता के कारण करते है। दीपावली में जो आप लोग लक्ष्मी गणेश की पूजा करते हैं, वो क्यों करते हैं? इसी दिन समुद्र मंथन हुआ था, तब उस में से लक्ष्मी जी उत्पन्न हुई थी। वो दिन दीपावली का दिन है अर्थात लक्ष्मी जी का हैप्पी बर्थडे है। लक्ष्मी जी के जन्मदिन के साथ दीपावली जुड़ गया। ये श्री राम के जन्म से पूर्व भी उसी दिन मनाया जाता था। परन्तु दीपावली तो जब १४ वर्ष बाद अयोधा राम आये उसके हर्ष में मनाई जाती है। अतएव लक्ष्मी जी की पूजा तो पहले से होती आ रही हैं, लेकिन बाद में उसी दिन के साथ दीपावली जुड़ गया। अतएव पूजा करना दीपावली मनाना नहीं हैं। आप लोग जो हैप्पी दीपावली बोलते है, उसका मतलब हैप्पी लक्ष्मी (दीपावली) हो गया है, जो दीपावली है ही नहीं।

तो हम लोग दीपावली नहीं मना रहे हैं। अपितु लक्ष्मी जी का जन्म उत्सव मना रहे हैं। क्योंकि अगर हम लोग दीपावली मनाते तो हम लोग उस परम पिता परमेश्वर श्रीराम चंद्र के बारे में बात करते, सोचते भजन कीर्तन करते। लेकिन हम लोग ऐसा नहीं करते है। हम लोग तो पटाके फोड़ते है जो वातावण को भी दूषित करता है। कुछ लोग पटाखे की पूजा भी करते है। भला कहा लिखा है या कौन से ग्रंथ में पटाखे की पूजा करने को कहा है? मेरे राय में तो पटाखे से दूर ही रहे तो अच्छा है। हाँ, अगर राम आगमन के उपलक्ष्य में भक्ति भाव से करे तो कुछ हद तक ठीक है। जब श्री राम आये तब नगरवासियों ने शंखों और भेरियों (वाद्य यंत्र) का प्रयोग किया था। इसलिए अगर प्रेमपूर्वक भगवान के प्रति कोई कार्य कर रहा हो तो वो कार्य सही है।

अयोध्या में जिस दिन राम आने वाले थे, वो १४ वर्ष पूर्ण होने का दिन था। पहले तो नगर के लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे थे। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं (कि क्या बात है श्री रामजी क्यों नहीं आए)। परन्तु हनुमान जी ने जब भरत जी को राम आगमन की सुचना दी तब नगर के लोग को यकीन हो गया की मेरे राम आएगे। तो इतने वर्षोंके बाद श्री राम का आगमन होने को था इसलिए प्रजा ने श्री राम के आने से पहले मार्ग घर आदि साफ किया, रास्ते में सब ओर लावा और फूल बिखेर दियें, मकानों को सुनहरी पुष्प मालाओं, धनीभूत फूलों के मोटे गजरों, सूत के बंधन से रहित कमल आदि के पुष्पों इत्यादि से सजा दिया। विस्तार से पढ़े राम का अयोध्या आगमन - वाल्मीकि रामायण अनुसार

अतएव अयोध्या की प्रजा ने घर साफ किया, ताकि मेरे स्वामी, मेरे परम प्रिय राम! इतने वर्षों के बाद आ रहे है और सब गन्दा हो तो उनको अच्छा नहीं लगेया। ये प्रेम भाव से प्रजा ने सब कुछ साफ किया था। सघन काली अमावस्या की वह रात्रि थी। इसलिए उन्होंने दीयों की लाइन लगा दिया (दीयों की लाइन से दीपावली कहा जाता है)। वो भी २,४ , १० नहीं। अपितु इतने दिये जलाये की हर तरफ उजाला ही उजाला था, क्यों? उनके आगमन के हर्ष में।

इतना प्रेम से, भक्ति भाव से ये सब किया था। आज यही लुप्त हो गया है। लोग दीपावली के दिन नए कपडे दुसरो को दिखाने के लिए पहनते है, सफाई इस लिए करते क्योंकि बारिश का मौसम समाप्त हुआ, दीपक इसलिए जलाते है कि लक्ष्मी हमारे घर आये, और राम के प्रति प्रेम का हल तो लोगों का अंतःकरण ही जनता है।

राम आगमन की कुछ झलक।

सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं॥
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥2॥
- श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड

भावार्थः - खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजी ने प्रभु की कुशल कहकर सबको समझाया। नगर निवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े॥2॥

बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥3 ख॥
- श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड

भावार्थः - बहुत सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ीं आकाश में विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वर से सुंदर मंगल गीत गा रही हैं।

ततोऽभ्यवकिरंस्त्वन्ये लाजैः पुष्पैश्च सर्वतः।
समुच्छ्रितपताकास्तु रथ्याः पुरवरोत्तमे॥८॥
रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १२७

भावार्थः - तत्पश्चात दूसरे लोग रास्ते में सब ओर लावा और फूल बिखेर दें। इस श्रेष्ठ नगर की सड़कों के अलग-बगल में ऊंची पताकाएँ फहरा दी जायँ।

फिर कहा कि कल सूर्योदय तक लोग नगर के सब मकानों को सुनहरी पुष्प मालाओं, धनीभूत फूलों के मोटे गजरों, सूत के बंधन से रहित कमल आदि के पुष्पों इत्यादि से सजा दें।

राजमार्गमसम्बाधं किरन्तु शतशो नराः।
ततस्तच्छासनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य मुदान्विताः॥१०॥
रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १२७

भावार्थः - राजमार्ग पर अधिक भीड़ ना हो, इसकी व्यवस्था के लिए सैकड़ों मनुष्य सबौर लग जाएँ।' शत्रुघ्न का वह आदेश सुनकर सब लोग बड़ी प्रसन्नता के साथ उसके पालन में लग गये।

हम लोगों को विचार करना चाहिए कि जो कुछ हम दीपावली के दिन करते है, उसका कारण क्या है? क्या वो कार्य, हम श्री राम को केंद्र में रखकर कर रहे है या संसारी लोगो को केंद्र में रखकर कर रहे है? इसलिए आप अपने अंतःकरण से पूछे "क्या हम दीपावली मना रहे है?"

अवश्य पढ़े रामगीता: केवल एक बार राम ने प्रजा को उपदेश दिया था।

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