आत्मा सर्वव्यापक है, यह गीता में कहा गया है?

आत्मा सर्वगत है?

“आत्मा सर्वगत है अर्थात् सर्वव्यापक है। यह गीता कह रही है” - ऐसा कुछ लोग कहते हैं। वे लोग गीता के २ अध्याय के २४ श्लोक का प्रमाण देते है। गीता के २ अध्याय के २४ श्लोक में ‘आत्मा सर्वगत है’ ऐसा कहा भी गया है। और आत्मा सर्वव्यापक नहीं है, इसका उल्लेख “आत्मा शरीराकार या सर्वव्यापक नहीं है” लेख में तर्क तथा वेद-गीता के प्रमाणों द्वारा बताया गया है।

इसलिए यदि हम आत्मा को सर्वगत (सर्वव्यापक) मानते हैं, तो यह वेद-वेदांत तथा गीता के सिद्धांत के विरुद्ध एक सिद्धांत होगा। अतः गीता में कही गई यह बात सत्य है या असत्य है? क्या गीता के इस श्लोक में मिलावट है या नहीं है? यदि नहीं, तो आत्मा सर्वव्यापक कैसे है? अतएव, पहले गीता के इस श्लोक को पूरा पढ़ते है-

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
- गीता २.२४

अर्थात् :- (श्री कृष्ण कहते है) यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती), अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है। यह नित्य, सर्वगत (सर्वव्यापक), स्थाणु (स्थिर), अचल और सनातन है।

इस श्लोक में संस्कृत का ‘सर्वगतः’ शब्द आता है। जिसका अर्थ सर्वव्यापक है। गीता पर टीका लिखने वालों ने भी ‘सर्वगतः’ को सर्वव्यापक कहा है। इसलिए, इस शब्द का अर्थ सही है। तो क्या यह मिलावटी है? नहीं, क्योंकि आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने और जितने भी अन्य टीकाकारों ने भी गीता के इस श्लोक पर भाष्य लिखा है। अतः यह कहना सही नहीं है कि गीता के इस श्लोक में मिलावट है।

अब गीता के इस श्लोक को देखकर और हमारे “आत्मा शरीराकार या सर्वव्यापक नहीं है - वेद, गीता के अनुसार” लेख को पढ़कर। विरोधाभास होता है कि क्या सही है? अगर यह श्लोक सही है तो आत्मा को सर्वव्यापक स्वीकार करना होगा और अगर सर्वव्यापक स्वीकार करें तो वेद विरुद्ध सिद्धांत। लेकिन अगर ध्यान देकर ‘सर्वव्यापक’ शब्द पर विचार करें, तो विरोधाभास का, शंका का समाधान हो जायेगा।

ध्यान दे, ‘सर्वव्यापक’ शब्द का अर्थ है जो हर जगह व्याप्त हो। लेकिन कैसे हर जगह व्याप्त हो? बस इसी पर विचार करना है। भगवान के बारे में निर्विवाद सिद्धांत है कि “घट-घट व्यापक राम” अर्थात् भगवान हर कण में है। यहाँ तक की आत्मा के अंदर व्याप्त है। गीता १८.६१ कहती है “ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देश्ऽर्जुन तिष्ठति।” अर्थात् “(श्री कृष्ण कहते है) अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय-देश में स्थिति है।"

अतः भगवान के लिए ‘सर्वव्यापक’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि वह कण-कण में व्याप्त है अर्थात् हर कण - हर स्थान में है। लेकिन आत्मा के लिए ‘सर्वव्यापक’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि वह हर जगह है अर्थात् इस पृथ्वी के आलावा अनन्य जगहों पर भी है किसी अनन्य अरूप में। क्योंकि यह आत्मा कण-कण में व्याप्त है ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन आत्मा अनन्य जगहों पर है इस विषय में “क्या एलियंस होते है?” उस लेख में हमनें बताया है।

अतएव, आत्मा सर्वव्यापक है। लेकिन भगवान की तरह यह हर कण-कण में व्याप्त नहीं है। इसका अस्तित्व कई स्थानों पर है। इसीलिए आत्मा सर्वव्यापक है।

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