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भागवत - वेदव्यास जी ने कहा कि धर्म सिर्फ एक है।

भागवत धर्म सिर्फ एक है।
श्रीमद्भागवत के रचयिता वेदव्यास जी ने कहा कि धर्म सिर्फ एक है। उन्होंने लिखा भागवत ६.३.२२
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥
भावार्थ :- "धर्म बस एक है भगवान श्री कृष्ण की भक्ति।" भागवत ६.३.२५ कहती है कि "जो मीठी-मीठी बातें लिखी हैं वेद में कि वर्ग में बड़ा सुख है, उनके चाकर में मत आओ।"

सारांश - धर्म-कर्म का पालन से क्या होता है?

धर्म कर्म अगर सही सही किया जाये तो पाप नष्ट होगा। तैत्तिरीय आरण्यक ६.२.१७ में कहा "तमाम प्रकार के जितने भी धर्म है उसे से पाप नष्ट होता है।" इसी को भागवत ६.२.१७ कहा गया है कि नाधर्मजं तद्धृदयं तदपीशाङ्घ्रिसेवया भावार्थ :- "जितने भी यज्ञ कर्म धर्म है उनसे पाप नष्ट होता है। लेकिन हृदय (मन) सुद्ध नहीं होता।" धर्म-कर्म का पालन करने से क्या होता है? अधिक जानकारी के लिए पढ़े वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। इसलिए फिर कहती है भागवत ४.२९.४६
यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥
भावार्थ :- जिस पर भगवान कृपा करते हैं वह कर्म धर्म के चक्कर में नहीं पड़ता।
तो वह भक्त क्या कहता है? भागवत ४.२९.४९ तत्कर्म हरितोषं यत्सा "कर्म क्या है जिससे भगवान प्रसन्न रहो बस वही कर्म वही धर्म।" मैत्रेयी उपनिषद १.१३ "धर्म-कर्म के को छोड़कर जो मेरी भक्ति करता है वह मेरे समान हो जाता है।"
कर्म धर्म से संबंधित मैत्रेयी उपनिषद में एक कथा है कि एक ब्राह्मण ऋषि से एक व्यक्ति ने पूछा कि आजकल तुम संध्या नहीं करते? क्या बात है? तो उस ब्राह्मण ऋषि ने कहा यह जानना है तो आप इस लेख को पढ़ें क्यों एक ऋषि ब्राह्मण होकर भी संध्या नहीं कर रहा - कथा मैत्रेयी उपनिषद की। मैत्रेयी उपनिषद १.१३ कहती है कि वह मूर्ख लोग वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हैं। कर्म फल भोगते रहते हैं और ८४ लाख में घूमते रहते हैं। और अधिक जानने के लिए पढ़े वेद - कर्म-धर्म का पालन करने वाले घोर मूर्ख है।
भगवान स्वयं कह रहे हैं भागवत ११.११.३२ और भागवत १.१५.१७ यह कहते हैं कि "जो सब कर्म धर्म को छोड़ कर के मेरी भक्ति करते हैं, उनको मैं, मेरा ज्ञान, मेरा आनंद मिलता है और माया का अत्यंत आभाव हो जाता है अर्थात माया सदा को चली जाती है।

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