सती का सीता का रूप धारण करके राम की परीक्षा लेना। - सती शिव की कथा

सती शिव की कथा
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने यह कथा लिखा है। तुलसीदास जी ने जो चौपाई व दोहा में लिखा उसी को हम आपके बतायेगे।
यह ध्यान रहे की यह लीला है, लीला भगवान रचते है। जो कुछ भगवान करते है उसे लीला कहते है। और लीला में बुद्धि नहीं लगाते है। लीला क्या है तो एक शब्द में कहे तो झूठ। यह वास्तविकता नहीं। लेकिन ऐसा किसी समय हुआ है, यह सत्य है। लेकिन जो लीला में होता है वो वास्तविक बात नहीं है। भगवान हम लोगों के लिए लीला करते हैं। लीला के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े लीला क्या है? लीला का मतलब? भगवान की लीला की वास्तविकता।

शिवजी और सती जी का अगस्त्य ऋषि के पास जाना और कैलास गमन।

तो बहुत समय पहले एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सती जी भी थीं। अगस्त्यजी ने संपूर्ण जगत्‌ के ईश्वर शिव जी का पूजन किया। फिर अगस्त्यजी ने राम कथा शिवजी और माँ सती को विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुंदर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको रहस्य सहित भक्ति का निरूपण किया। श्री रघुनाथजी के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनों तक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर शिवजी व सतीजी के साथ घर (कैलास) को चले दिए।

शिव का राम को प्रणाम

जब शिवजी व सतीजी के साथ घर (कैलास) की ओर दण्डकवन होते हुए जा रहे थे। उसी दण्डकवन वन में श्री राम माँ सीता को ढूढ़ रहे थे। तब भगवान शिव ने तपस्वी वेश में श्री राम को दण्डकवन में माँ सीता की खोज करते देख, उन्होंने दूर से ही श्री राम को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया।

माँ सती को शंका

सतीजी ने शंकरजी को राम को प्रणाम करते देख मन में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया। वे मन ही मन कहने लगीं कि शंकरजी की सारा जगत्‌ वंदना करता है, वे जगत्‌ के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं। उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया और राजपुत्र की शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गए कि अब तक उनके (शिव के) हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती।
माँ सती सोचने लगी कि जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है? देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करने वाले जो विष्णु भगवान्‌ हैं, वे भी शिवजी की ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञान के भंडार, लक्ष्मीपति और असुरों के शत्रु भगवान्‌ विष्णु क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे?

शंकर जी का माँ सती को समझाना

भवानी जी ने कुछ नहीं कहा पर अन्तर्यामी शिवजी सब जान गए। शिवजी - हे सती! सुनो, तुम्हारा स्त्री स्वभाव है। ऐसा संदेह मन में कभी न रखना चाहिए। फिर शिव जी बोले हे सती ! सुनो, ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरंतर निर्मल चित्त से जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र 'नेति-नेति' कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतंत्र, ब्रह्मा रूप भगवान्‌ श्री रामजी ने अपने भक्तों के हित के लिए रघुकुल के में अवतार लिया है। यद्यपि शिवजी ने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा।

महादेव ने आज्ञा दी जाकर परीक्षा लो।

तब महादेवजी मन में भगवान्‌ की माया का बल जानकर मुस्कुराते हुए बोले -
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥॥
जो तुम्हारे मन में बहुत संदेह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती? जब तक तुम मेरे पास लौट आओगी तब तक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ। जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो, विवेक के द्वारा सोच-समझकर तुम वही करना। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चलीं और मन में सोचने लगीं कि क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ)?

सती का सीताजी का रूप धारण करना और लक्ष्मणजी का भ्रम होना।

सती ने अपनी शक्ति से सीताजी का वही वास्तविक रूप धारण करके उस मार्ग की ओर आगे होकर चलीं, उसी मार्ग से राजा रामचंद्रजी आ रहे थे। सीता जी के वेष को देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गए और उनके हृदय में बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गंभीर हो गए, कुछ कह नहीं सके। लेकिन क्योंकि धीर बुद्धि लक्ष्मण प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा।

श्री रामचंद्रजी सती की परीक्षा को जान गए।

अंतर्यामी श्री रामचंद्रजी सती का सीता का रूप धारण के बात को जान गए। पहले श्री राम ने हाथ जोड़कर सती को प्रणाम किया। फिर हँसकर कोमल वाणी से बोले कि शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिए फिर रही हैं।